चार लाख की निधि गबन करने वाला शख्स क्यों बनना चाहता है नगर पालिका अध्यक्ष। महाराजा मानवेंद्र शाह से लेकर अबतक के भाजपा सांसद व विधायक आंख बुंदकर जताते हैं इस शख्स पर भरोसा । शख्स भाजपा का एकमात्र नेता जो नहीं किसी भी बूथ पर पार्टी के खिलाफ पड़े वोटो का जिम्मेदार। Why does a person who embezzled funds worth Rs 4 lakh want to become the municipality president? From Maharaja Manvendra Shah till now, BJP MPs and MLAs blindly express their trust in this person. The person is the only leader of BJP who is not responsible for the votes cast against the party at any booth

      गजेन्द्र सिंह चौहान, पुरोला


आज के अंक में हम भाजपा के एक ऐसे नेता की चर्चा कर रहे है जो विधायक व सांसद निधि को गबन करने में माहिर है। एक तरफ भाजपा के वोट दिलाऊं कार्यकर्ता लाभ से सदेव वंचित रहते है,जिसका गुस्सा समय समय पर पार्टी प्रत्याशियों को हराकर कार्यकर्ता जता देते हैं। सुनने में ये आया कि उक्त शख्स निधि व जिला प्लान को हड़पने के


अलावा कोई कार्य ही नहीं करता है व बड़ी आलीशान जिंदगी जी रहा है। उक्त कार्यकर्ता की कार्यशैली भाजपा के अन्य नेताओं से बिल्कुल भिन्न है। ये शख्स किसी भी आंदोलन में भीड़ देखकर सबसे आगे खड़ा होकर के फोटो खिंचवाकर संबंधित सांसद व विधायक को अपनी लोकप्रियता से वाकिफ करता है। इन शख्स की भीड़ के आगे की फोटो देखकर सांसद व विधायक इन्हें जननायक समझ कर निधि व जिला प्लान का पारितोषिक देते है। उक्त शख्स इतना बुद्धिजीवी है कि कुछ पहले समय संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को हर बूथ पर मिले अबतक के सर्वाधिक कम मतों के बावजूद ये किसी भी बूथ के लिए जिम्मेदार नहीं है। खैर हमने इनके द्वारा सांसद व विधायक निधि से इनके द्वारा कराए गए कार्यों के बारे में संबंधित ग्रामों के भाजपा कार्यकर्ताओं से पूछा तो उन्होंने इनके द्वारा कराए गए किसी भी विकास कार्य के बारे मे अनविज्ञता जताई है।  ये शख्स इतना चतुर है कि अभितक गबन किए सांसद व विधायक निधि में से एक रुपए भी पार्टी के लिए खर्च नहीं किया हैं। यहां तक कि शख्स पार्टी के कार्यक्रमों में देहरादून व उत्तरकाशी दूसरे कार्यकर्ताओं की गाड़ी में उनके ही खर्च से उन्हें पार्टी का टिकट दिलाने व अन्य प्रकार का झांसा देकर विगत 30 वर्षों से खूब मजे ले रहा है। उपरोक्त कथन से जाहिर है कि भाजपा कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत का पुरस्कार खाने वाले उक्त शख्स से भाजपा को सावधान रहना चाहिए व इस प्रकार के नेता पार्टी के प्रति कार्यकर्ताओं में व्यापक नाराजगी प्रकट करते हैं।


पिछले अंक में आपने पढ़ा था

बात पुरोला की करे तो हाल ही में भाजपा ने अपने सदस्यता अभियान का रिजल्ट घोषित किया है । उक्त रिजल्ट में हर नेता को विजयी घोषित कर उसकी पीठ थपथपाई है । पीठ थपथपाने की मुख्य वजह थी कि हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले कुल मतों से भी दुगुने लोगों को भाजपा की सदस्यता दिलाई गई थी । जो असंभव था उसे संभव कर स्थानीय भाजपा नेताओं ने बता दिया कि इसे कहते हैं महा भ्रष्टाचार। सदस्यता अभियान के नतीजों से स्पष्ट है कि पुरोला का 90 प्रतिशत मतदाता भाजपा के साथ है , अब जिसे चाहो टिकट दो प्रत्याशी जीत ही जाएगा । खैर अगर सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो तो कांग्रेस के एकमात्र चेहरे है बिहारी लाल शाह ओर वे अपनी तैयारी लगातार कर रहे है। सामान्य सीट के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष दीपक बिजल्वाण अपने सहयोगियों के लिए  जन संपर्क कर रहे है व पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष हरिमोहन नेगी भी पूर्ण विश्वास के साथ जनसंपर्क कर रहे है ।

वहीं भाजपा के पास अनुसूचित जाति में पूर्व में चुनाव हारे अमीचंद शाह व पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष पीएल हिमानी में से किसी का भी टिकट काटना बड़े ही घाटे का सौदा हो सकता है, वही भाजपा की एक बड़ी ताकत की अनदेखी भी पड सकती हैं बड़ी महंगी । बात पत्ते की हैं कि भाजपा ने धुर विरोधीयो को एक मंच पर लाकर बड़ी गलती की है जिसका खामियाजा निकाय चुनाव में भुगतना तय है। अब बात करें सामान्य सीट की तो पूर्व में चुनाव हारे उपेन्द्र असवाल उर्फ राधे राधे व पवन नोटियाल में से किसी का भी टिकट काटने का मतलब पार्टी को नुकसान होना तय । भाजपा के पास किसी तीसरे लोकप्रिय चेहरे पर भरोसा जताने का भी विकल्प है पर भाजपा ने अपनी रीति व नीति से किसी को भी लोकप्रिय होने ही नहीं दिया । भाजपा के भीतर एक बहुत बड़ा चलन अब पार्टी की नीति बन गई है कि आप जनता में कितने भी अलोकप्रिय है पर अगर आपने 36 संघ के नेताओं व 75 भाजपा नेताओं की चरण वंदना कर दी तो आपका टिकट तय है। 

पिछले अंक में अभितक आपने पढ़ा:- 



पुरोला के रण में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी सामने आ रहे हैं , कबर स्टोरी में आज गतांक से आगे जानेंगे कि लगातार दो चुनाव में हार के बाद क्या भाजपा प्रत्याशी चयन में सतर्कता बरतेगी या टिकट को मैनेजमेंट का विषय बनाकर एक सीट के नुकसान उठाने का रिश्क उठायेगी ।  हम ये भी जानेंगे कि पुरोला के नेताओं की जुबान पर गैरोला भाईसाहब का नाम इतने सम्मान से क्यो लिया जाता है। आखिर कौन है गैरोला भाईसाहब जिनके दर पर हाजिरी लगाना हर नेता अपना सौभाग्य समझता है । 


अभीतक की कबर स्टोरी में पुरोला के जानेमाने चेहरों का एक सूक्ष्म परिचय

बिहारी लाल ने सहनशीलता व धैर्य की कसौटी पर खरा उतरकर अपना ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जिस पर मौसम की मार कितनी भी पड़े वे सदैव मुस्कराते ही रहते हैं 


  गजेन्द्र सिंह चौहान, पुरोला


 राजनीति के सहमात के खेल में पुरोला का अपना एक विशिष्ट स्थान है ।


हो भी क्यो नही ? देश की राजधानी दिल्ली के बाद  पुरोला ही एकमात्र ऐसा शहर है जहां हर राजनीतिक दल के समर्थक मौजूद हैं । यहां हर नुक्कड़ चौराहे पर राजनीतिक घटनाक्रम पर गर्मजोशी के साथ चर्चा- परिचर्चा होना आम हैं । यही नही चाहे अमेरिका का चुनाव हो या यूके का यहां राजनीतिक बहस आम है ।
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आइये असल मुद्दे पर लौटकर बात कर लेते हैं दो धुर विरोधी राजनीतिक जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी को अपनी सेवाएं दे रहे हैं । पहले व्यक्ति हैं मालचंद जो पुरोला के दो बार के विधायक व मामूली अंतर से तीन चुनाव हार चुके हैं ।

दूसरी है व्यक्ति है पीएल हिमानी जो नगर पंचायत पुरोला के पूर्व व प्रथम अध्यक्ष रहे हैं । पीएल हिमानी दो बार पुरोला ब्लॉक के प्रमुख भी रह चुके हैं ।



दोनों के राजनीतिक सफर की हल्की सी चर्चा कर राजनीति के सहमात के खेल में दोनों एक दूसरे के कैसे धुरविरोधी बने , ये जानना भी अत्यंत जरूरी है ।

खैर उससे पहले हम बात कर लेते हैं एक तीसरे खिलाड़ी अमीचंद शाह की । अमीचंद शाह की धर्मपत्नी पूर्व में पुरोला के हुडोली वार्ड से जिला पंचायत सदस्य रही है । उससे पूर्व अमीचंद शाह बीडीसी में मेम्बर चुने गए थे व पूर्व विधायक राजेश जुवांठा के साथ गठजोड़ कर ज्येष्ठ प्रमुख का चुनाव लड़कर पीएल हिमानी को चुनौती दी । उस वक्त राजेश व अमीचंद पीएल हिमानी को चुनौती देने में विफल रहे व दोनों को बैलेट फाड़ने के कारण जेल भी जाना पड़ा । उसके बाद राजेश जुवांठा मालचंद को हराकर विधायक बन गए बावजूद उन्हें जेल जाना पड़ा । उसके बाद नगर पंचायत पुरोला के प्रथम चुनाव में अमीचंद ने भाजपा के टिकट पर पीएल हिमानी को एक बार फिर मालचंद के सहयोग से चुनौती दी पर वहां भी उन्हें नाकामयाबी मिली ।

अब बात कर लेते है एक और खिलाड़ी यानी राजेश जुवांठा की । उपरोक्त कथन में इष्टपस्ट है कि पीएल हिमानी से प्रमुख के मुकाबले में उन्होंने चुनौती जरूर दी थी मगर सफल नही हुए । आगे जनता ने जोर लगाया तो वे पुरोला के विधायक बने मगर अगली विधानसभा चुनाव में मालचंद से बुरी तरह पराजित हो गए व उसके अगले चुनाव में मालचंद के लिए चुनाव प्रचार किया ।

खबर लिखे जाने तक उपरोक्त चारो खिलाड़ी भाजपा के कर्मठ सदस्य हैं, ये तो वक्त ही बताएगा कि आगे तीनो भाजपा को मजबूत करते हैं या इनमेसे कोई भाजपा के खिलाफ होता है ।

अब बात करते हैं भाजपा के पॉचवे स्तम्भ यानी पांचवे खिलाड़ी प्रकाश कुमार उर्फ प्रकाश डबराल उर्फ टावरिया नेता की जो किसानों की समस्याओं को लेकर समय-समय पर भूख हड़ताल कर चुके हैं । यही नही इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर 19 सूत्री मांगों को लेकर 1व वर्ष के समयान्तराल के बाद पुनः टॉवर पर चढ़े है । उनकी 19 सूत्री मांगों में शिकरू मोटर मार्ग, सर बडियार मोटर मार्ग, सांखला मोटर मार्ग, सुरानु की सेरी मोटर मार्ग व श्रीकोट मोटर मार्ग जैसी ज्वलंत समस्याएं प्रमुख रूप से सामिल रही है ।

भाजपा के पांच खिलाड़ियों की चर्चा के बाद हम अब बात करते हैं सदैव मुस्कराने वाले, शोम्य स्वभाव के धनी, मृदभाषी व गौरीपुत्र के नाम से मशहूर कांग्रेस नेता बिहारी लाल की । ज्वलंत विषय ये है कि क्या भाजपा के पांचों खिलाड़ी एकजुट होकर बिहारी लाल के खिलाफ होंगे या भाजपा की परंपरा के मुताबिक दिन में एकजुट रहेंगे व रात में बिहारी के साथ ।



उपरोक्त तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए हम बात करते हैं दो लालो बिहारी लाल शाह जो की कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं व पीएल हिमानी जो पुराने कांग्रेसी है व वर्तमान में भाजपा के एक प्रमुख चेहरे है साथ ही दो बार पुरोला के ब्लॉक प्रमुख व पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष है ।
बात करे जातिगत समीकरणों की तो पूर्व विधायक मालचंद की अपेक्षा इन दोनों को अनुसूचित जाति के मतदाताओं का व्यापक समर्थन हैं । अगर दोनों महारथी आमने सामने हो तो जाहिर बात है कि अनुसूचित जाति के मतदाता बंटेंगे व दोनों ही महारथी इस जंग में नाते रिस्तेदारी के समीकरणों के आधार पर अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेंगे ।
वैसे राजनीतिक विश्लेषक यही मानते हैं कि दोनों लाल विगत कई वर्षों से एकसाथ काम करते आये हैं ओर वे किसी भी सूरत में एक दूसरे के खिलाफ चुनाव नही लड़ेंगे । अगर दोनों के व्यक्तित्व की बात करे तो पीएल हिमानी को राजनीतिक हलकों में राज्य की राजधानी ही नही अपितु दिल्ली तक सम्मान दिया जाता है । उनके व्यक्तित्व से जनता हो या नेता या यों कहें कि चपरासी से लेकर अधिकारी हर कोई उनका सम्मान करता है । ऐसे में  उनके लिए बिहारी लाल कैसे चुनौती बन सकते हैं ये जानना आवश्यक हो जाता है ।
बिहारी लाल ने सहनशीलता व धैर्य की कसौटी पर खरा उतरकर अपना ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जिस पर मौसम की मार कितनी भी पड़े वे सदैव मुस्कराते ही रहते हैं । बिहारी को कोई गाली दे या धमकी दे वे सदैव हाथ जोड़कर मुस्कराते है । 
बिहारी की सदा मुस्कराने व शालीनता का यहाँ हर कोई दीवाना है बस यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है जो भाजपा के पांच दिग्गजों के लिए गंभीर चुनौती है ।

आगे जानते हैं मुख्यमंत्री घोषणा के नामपर पुरोला के ठेकेदारों का शोषण करने वाला कौन ?

दो वर्ष पूर्व नगर पालिका पुरोला में मुख्यमंत्री घोषणा के नाम पर लगभग 50 करोड़ की निविदाएं आमंत्रित की गई थी । गौर करने वाली बात थी कि मुख्यमंत्री पुष्कर धामी आमचूनावो के अलावा पुरोला नही आये थे तब ये तमाम घोषणाएं आखिर किस स्थान से की गई । खैर खबर ये थी कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने इन योजनाओं के एवज में सभी ठेकेदारों से 12% अग्रिम घुस ली जिसे पुरोला में प्रोपोजल की संज्ञा दी जाती है ।सुनने में ये आया कि इस सुनहरे अवसर का लाभ उठाने के लिए ठेकेदारों ने आनन-फानन में 6% ब्याज पर मार्केट से पैसे उठाया व उक्त नेता को दे दिये । खबर ये आई कि मुख्यमंत्री घोषणा के नामपर जिस नेता ने अग्रिम 12% कमीशन खाई उसने अन्य नेताओं को हिस्सा नही दिया । वैसे भी मुख्यमंत्री घोषणा के नामपर नगर पालिका पुरोला को मिलने वाले धन से एक अन्य नेता में भारी बैचेनी थी । खैर 12% कमीशन में हिस्सेदारी का ईमानदारी से बंटवारा न होने का प्रतिफल तुरंत मिला व सभी योजनाएं विलोपित हो गई । ठेकेदारों में 12 प्रतिशत रकम जो लगभग 6 करोड़ रुपये का गम तो था पर उन्हें खुसी इसबात की थी कि उन्होंने इन योजनाओं पर कार्य नही किया है जिससे वे ओर जादा नही डूबे । पर ये भी जादा दिन नही चला व उन्हें नगर पंचायत ने नोटिस देकर काम करने को कहा । ठेकेदारों को आस्वासन मिला कि काम करो व अपना पेमेंट लो । ठेकेदारों ने पुनः मार्केट से पैसे उठाये व काम पूर्ण कर दिया व पहले से कर्ज जाल में फंसे ठेकेदार इस जाल में फंस गए ।
ठेकेदारों ने मिलकर तय किया कि हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाय जिसके लिये चंदा इकट्ठा किया गया व उक्त चंदा भी उक्त कमीशन खाने वाले नेता को दिया गया मगर दो साल बीत गये पर हाईकोर्ट में रिट दायर नही हो सकी ।
खैर लुटे-पिटे ठेकेदारों को अब एक नेता ने चुनाव जीताने की गारंटी देने के नामपर विलोपित योजनाओं की बहाली की बात कही है । खैर भाजपा व कांग्रेस के दो नेता पुरोला की जनता व निर्दोष ठेकेदारों के बहुत बड़े गुनाहगार है व जनता इन्हें उचित जवाब के लिए समय की प्रतीक्षा करती नजर आ रही है ।

आगे जानते है पुरोला के रण में भाजपा को क्यों मिली लगातार 2 हार ।


आप मे से अधिकतर ये जानते होंगे कि नगर पंचायत पुरोला के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष पीएल हिमानी है जो इससे पूर्व पुरोला के लगातार दो बार ब्लॉक प्रमुख रहे हैं व जीवन मे कोई चुनाव नही हारे हैं । दूसरी बार हरिमोहन नेगी ने निर्दलीय द्वारा मिली कांटे की टक्कर के बावजूद जीत दर्ज की । यहां ये भी विदित हो कि चाहे पीएल हिमानी हो या हरिमोहन नेगी दोनों ही कांग्रेस के टिकट पर या यों कहें कि कांग्रेस के समर्थन से चुनाव जीते हैं । दोनों ही चुनावो में कद्दावर नेताओं की भरमार के बावजूद भाजपा बुरी तरह से चुनाव हारी है । अब हम बात करते हैं कि रंवाई की मशहूर कहावत "बोता बिराऊ मूसे न मारद" कैसे भाजपा नेताओं पर फिट बैठती है । इसका ज्वलंत उदाहरण लोकसभा चुनाव में पुरोला विधानसभा से भाजपा नेताओं के खिलाफ उठी खतरनाक लहर को आप सभी ने देखा व महसूस किया है । पुरोला विधानसभा से उठी भाजपा नेताओं के खिलाफ खतरनाक लहर का असर इतना व्यापक था कि उत्तरकाशी जनपद में तो भाजपा बुरी तरह पिछडी पर इसका असर पड़ोस की चकराता विधानसभा में भी व्यापक रूप से देखा गया । अब सवाल ये हैं की एक तरफ पुरोला विधानसभा में चल रहे सदस्यता अभियान के क्रम में पुरोला के मतदाताओं का लगभग अभीतक 80% भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुका है बावजूद भाजपा के नेताओं के खिलाफ आम जनता का आक्रोश कायम है । एकबार ये भी जान लेते हैं कि वो कौन नेता हैं जिनके नेतृत्व में भाजपा ने लोकसभा चुनाव लड़ा था, पहला नाम है विधायक दुर्गेश्वर लाल का , दूसरा नाम पूर्व विधायक मालचंद, तीसरा नाम पूर्व विधायक राजेश जुवांठा, चौथा नाम पूर्व विधायक राजकुमार, पांचवे है पूर्व जिलाध्यक्ष रमेश चौहान, छठे है पूर्व जिलाध्यक्ष जगत चौहान व सातवे महारथी है पूर्व जिलाध्यक्ष श्याम डोभाल ।
खैर आप सभी ने देखा कि लोकसभा चुनावों में इनमेसे कुछ नेताओं के खिलाफ आक्रोश था जिसकी बानगी चुनाव परिणाम में इसका असर व्यापक था ।
अब बात करते हैं नगर पालिका चुनाव में अभीतक मिली करारी हार का तो इसका प्रमुख कारण भाजपा नेताओं द्वारा मतदाताओं को बन्दूवा मजदूर समझने की सोच है । भाजपा नेताओं की आपसी बातचीत में सिर्फ गैरोला भाईसाहब का जिक्र होता है, उन्हें लगता हैं कि गैरोला भाईसाहब खुश होंगे तो आपका टिकट पक्का है । गैरोला भाईसाहब की कृपा रही तो आप मण्डल अध्यक्ष बन सकते हैं आप जिले में कही भी मंनोनित पदाधिकारी बन सकते हैं । यही कारण है जिसने भाजपा नेताओं को आम जनता से दूर कर दिया है ।
भाजपा नेताओं से जनता की दूरी का दूसरा प्रमुख कारण है संसाधनों पर चंद नेताओं का कब्जा । जिला योजना हो या सांसद निधि या हो विधायक निधि ये सिर्फ चंद नेताओं के घर , खलिहान व खेतो में नजर आती है । भाजपा के 5-6 नेताओं का विकास यहां के हर भाजपा कार्यकर्ता की जुबान पर होता है व वे हर चुनाव में इसका प्रतिकार भाजपा प्रत्याशी को हराकर करते हैं ।
राजनीतिक विश्लेषण अभी अपडेट हो रहा है 

अस्वीकरण:- उपरोक्त विश्लेषण किसी भी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नही है ओर न किसी को महिमामंडन करने के उद्देश्य से लिखा गया है । उपरोक्त तथ्यों आमजनों के बीच होने वाली चर्चा के आधार पर लिखा गया है व इस लेख को किसी के प्रचार या दुष्प्रचार करने के उद्देश्य से नही लिखा गया है ।

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