पुरोला के रण में भाजपा की लगातार दो शर्मनाक हार के गुनाहगार कौन ? आखिर कौन हैं गैरोला भाईसाहब जिनके पास लगाता हैं यहाँ का हर नेता हाजिरी । कबर स्टोरी में आज रंवाई की मशहूर कहावत " बोता बिराऊ मूसे न मारदअ" अतार्थ जादा बिल्लियां चूहे नही मारती है कैसे भाजपा नेताओं पर फिट बैठती है । Who is responsible for BJP's two consecutive shameful defeats in the battle of Purola? After all, who is Gairola Bhaisaheb to whom every leader here attends? Today in Kabar Story, Ranwai's famous saying "Bota birau moose na marada" meaning most cats do not kill rats, how does it fit the BJP leaders.

    गजेन्द्र सिंह चौहान, पुरोला



पुरोला के रण में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी सामने आ रहे हैं , कबर स्टोरी में आज गतांक से आगे जानेंगे कि लगातार दो चुनाव में हार के बाद क्या भाजपा प्रत्याशी चयन में सतर्कता बरतेगी या टिकट को मैनेजमेंट का विषय बनाकर एक सीट के नुकसान उठाने का रिश्क उठायेगी ।  हम ये भी जानेंगे कि पुरोला के नेताओं की जुबान पर गैरोला भाईसाहब का नाम इतने सम्मान से क्यो लिया जाता है। आखिर कौन है गैरोला भाईसाहब जिनके दर पर हाजिरी लगाना हर नेता अपना सौभाग्य समझता है । 


अभीतक की कबर स्टोरी में पुरोला के जानेमाने चेहरों का एक सूक्ष्म परिचय

बिहारी लाल ने सहनशीलता व धैर्य की कसौटी पर खरा उतरकर अपना ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जिस पर मौसम की मार कितनी भी पड़े वे सदैव मुस्कराते ही रहते हैं 

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  गजेन्द्र सिंह चौहान, पुरोला


 राजनीति के सहमात के खेल में पुरोला का अपना एक विशिष्ट स्थान है ।


हो भी क्यो नही ? देश की राजधानी दिल्ली के बाद  पुरोला ही एकमात्र ऐसा शहर है जहां हर राजनीतिक दल के समर्थक मौजूद हैं । यहां हर नुक्कड़ चौराहे पर राजनीतिक घटनाक्रम पर गर्मजोशी के साथ चर्चा- परिचर्चा होना आम हैं । यही नही चाहे अमेरिका का चुनाव हो या यूके का यहां राजनीतिक बहस आम है ।
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आइये असल मुद्दे पर लौटकर बात कर लेते हैं दो धुर विरोधी राजनीतिक जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी को अपनी सेवाएं दे रहे हैं । पहले व्यक्ति हैं मालचंद जो पुरोला के दो बार के विधायक व मामूली अंतर से तीन चुनाव हार चुके हैं ।

दूसरी है व्यक्ति है पीएल हिमानी जो नगर पंचायत पुरोला के पूर्व व प्रथम अध्यक्ष रहे हैं । पीएल हिमानी दो बार पुरोला ब्लॉक के प्रमुख भी रह चुके हैं ।



दोनों के राजनीतिक सफर की हल्की सी चर्चा कर राजनीति के सहमात के खेल में दोनों एक दूसरे के कैसे धुरविरोधी बने , ये जानना भी अत्यंत जरूरी है ।

खैर उससे पहले हम बात कर लेते हैं एक तीसरे खिलाड़ी अमीचंद शाह की । अमीचंद शाह की धर्मपत्नी पूर्व में पुरोला के हुडोली वार्ड से जिला पंचायत सदस्य रही है । उससे पूर्व अमीचंद शाह बीडीसी में मेम्बर चुने गए थे व पूर्व विधायक राजेश जुवांठा के साथ गठजोड़ कर ज्येष्ठ प्रमुख का चुनाव लड़कर पीएल हिमानी को चुनौती दी । उस वक्त राजेश व अमीचंद पीएल हिमानी को चुनौती देने में विफल रहे व दोनों को बैलेट फाड़ने के कारण जेल भी जाना पड़ा । उसके बाद राजेश जुवांठा मालचंद को हराकर विधायक बन गए बावजूद उन्हें जेल जाना पड़ा । उसके बाद नगर पंचायत पुरोला के प्रथम चुनाव में अमीचंद ने भाजपा के टिकट पर पीएल हिमानी को एक बार फिर मालचंद के सहयोग से चुनौती दी पर वहां भी उन्हें नाकामयाबी मिली ।

अब बात कर लेते है एक और खिलाड़ी यानी राजेश जुवांठा की । उपरोक्त कथन में इष्टपस्ट है कि पीएल हिमानी से प्रमुख के मुकाबले में उन्होंने चुनौती जरूर दी थी मगर सफल नही हुए । आगे जनता ने जोर लगाया तो वे पुरोला के विधायक बने मगर अगली विधानसभा चुनाव में मालचंद से बुरी तरह पराजित हो गए व उसके अगले चुनाव में मालचंद के लिए चुनाव प्रचार किया ।

खबर लिखे जाने तक उपरोक्त चारो खिलाड़ी भाजपा के कर्मठ सदस्य हैं, ये तो वक्त ही बताएगा कि आगे तीनो भाजपा को मजबूत करते हैं या इनमेसे कोई भाजपा के खिलाफ होता है ।

अब बात करते हैं भाजपा के पॉचवे स्तम्भ यानी पांचवे खिलाड़ी प्रकाश कुमार उर्फ प्रकाश डबराल उर्फ टावरिया नेता की जो किसानों की समस्याओं को लेकर समय-समय पर भूख हड़ताल कर चुके हैं । यही नही इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर 19 सूत्री मांगों को लेकर 1व वर्ष के समयान्तराल के बाद पुनः टॉवर पर चढ़े है । उनकी 19 सूत्री मांगों में शिकरू मोटर मार्ग, सर बडियार मोटर मार्ग, सांखला मोटर मार्ग, सुरानु की सेरी मोटर मार्ग व श्रीकोट मोटर मार्ग जैसी ज्वलंत समस्याएं प्रमुख रूप से सामिल रही है ।

भाजपा के पांच खिलाड़ियों की चर्चा के बाद हम अब बात करते हैं सदैव मुस्कराने वाले, शोम्य स्वभाव के धनी, मृदभाषी व गौरीपुत्र के नाम से मशहूर कांग्रेस नेता बिहारी लाल की । ज्वलंत विषय ये है कि क्या भाजपा के पांचों खिलाड़ी एकजुट होकर बिहारी लाल के खिलाफ होंगे या भाजपा की परंपरा के मुताबिक दिन में एकजुट रहेंगे व रात में बिहारी के साथ ।



उपरोक्त तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए हम बात करते हैं दो लालो बिहारी लाल शाह जो की कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं व पीएल हिमानी जो पुराने कांग्रेसी है व वर्तमान में भाजपा के एक प्रमुख चेहरे है साथ ही दो बार पुरोला के ब्लॉक प्रमुख व पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष है ।
बात करे जातिगत समीकरणों की तो पूर्व विधायक मालचंद की अपेक्षा इन दोनों को अनुसूचित जाति के मतदाताओं का व्यापक समर्थन हैं । अगर दोनों महारथी आमने सामने हो तो जाहिर बात है कि अनुसूचित जाति के मतदाता बंटेंगे व दोनों ही महारथी इस जंग में नाते रिस्तेदारी के समीकरणों के आधार पर अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेंगे ।
वैसे राजनीतिक विश्लेषक यही मानते हैं कि दोनों लाल विगत कई वर्षों से एकसाथ काम करते आये हैं ओर वे किसी भी सूरत में एक दूसरे के खिलाफ चुनाव नही लड़ेंगे । अगर दोनों के व्यक्तित्व की बात करे तो पीएल हिमानी को राजनीतिक हलकों में राज्य की राजधानी ही नही अपितु दिल्ली तक सम्मान दिया जाता है । उनके व्यक्तित्व से जनता हो या नेता या यों कहें कि चपरासी से लेकर अधिकारी हर कोई उनका सम्मान करता है । ऐसे में  उनके लिए बिहारी लाल कैसे चुनौती बन सकते हैं ये जानना आवश्यक हो जाता है ।
बिहारी लाल ने सहनशीलता व धैर्य की कसौटी पर खरा उतरकर अपना ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जिस पर मौसम की मार कितनी भी पड़े वे सदैव मुस्कराते ही रहते हैं । बिहारी को कोई गाली दे या धमकी दे वे सदैव हाथ जोड़कर मुस्कराते है । 
बिहारी की सदा मुस्कराने व शालीनता का यहाँ हर कोई दीवाना है बस यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है जो भाजपा के पांच दिग्गजों के लिए गंभीर चुनौती है ।

आगे जानते हैं मुख्यमंत्री घोषणा के नामपर पुरोला के ठेकेदारों का शोषण करने वाला कौन ?

दो वर्ष पूर्व नगर पालिका पुरोला में मुख्यमंत्री घोषणा के नाम पर लगभग 50 करोड़ की निविदाएं आमंत्रित की गई थी । गौर करने वाली बात थी कि मुख्यमंत्री पुष्कर धामी आमचूनावो के अलावा पुरोला नही आये थे तब ये तमाम घोषणाएं आखिर किस स्थान से की गई । खैर खबर ये थी कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने इन योजनाओं के एवज में सभी ठेकेदारों से 12% अग्रिम घुस ली जिसे पुरोला में प्रोपोजल की संज्ञा दी जाती है ।सुनने में ये आया कि इस सुनहरे अवसर का लाभ उठाने के लिए ठेकेदारों ने आनन-फानन में 6% ब्याज पर मार्केट से पैसे उठाया व उक्त नेता को दे दिये । खबर ये आई कि मुख्यमंत्री घोषणा के नामपर जिस नेता ने अग्रिम 12% कमीशन खाई उसने अन्य नेताओं को हिस्सा नही दिया । वैसे भी मुख्यमंत्री घोषणा के नामपर नगर पालिका पुरोला को मिलने वाले धन से एक अन्य नेता में भारी बैचेनी थी । खैर 12% कमीशन में हिस्सेदारी का ईमानदारी से बंटवारा न होने का प्रतिफल तुरंत मिला व सभी योजनाएं विलोपित हो गई । ठेकेदारों में 12 प्रतिशत रकम जो लगभग 6 करोड़ रुपये का गम तो था पर उन्हें खुसी इसबात की थी कि उन्होंने इन योजनाओं पर कार्य नही किया है जिससे वे ओर जादा नही डूबे । पर ये भी जादा दिन नही चला व उन्हें नगर पंचायत ने नोटिस देकर काम करने को कहा । ठेकेदारों को आस्वासन मिला कि काम करो व अपना पेमेंट लो । ठेकेदारों ने पुनः मार्केट से पैसे उठाये व काम पूर्ण कर दिया व पहले से कर्ज जाल में फंसे ठेकेदार इस जाल में फंस गए ।
ठेकेदारों ने मिलकर तय किया कि हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाय जिसके लिये चंदा इकट्ठा किया गया व उक्त चंदा भी उक्त कमीशन खाने वाले नेता को दिया गया मगर दो साल बीत गये पर हाईकोर्ट में रिट दायर नही हो सकी ।
खैर लुटे-पिटे ठेकेदारों को अब एक नेता ने चुनाव जीताने की गारंटी देने के नामपर विलोपित योजनाओं की बहाली की बात कही है । खैर भाजपा व कांग्रेस के दो नेता पुरोला की जनता व निर्दोष ठेकेदारों के बहुत बड़े गुनाहगार है व जनता इन्हें उचित जवाब के लिए समय की प्रतीक्षा करती नजर आ रही है ।

आगे जानते है पुरोला के रण में भाजपा को क्यों मिली लगातार 2 हार ।


आप मे से अधिकतर ये जानते होंगे कि नगर पंचायत पुरोला के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष पीएल हिमानी है जो इससे पूर्व पुरोला के लगातार दो बार ब्लॉक प्रमुख रहे हैं व जीवन मे कोई चुनाव नही हारे हैं । दूसरी बार हरिमोहन नेगी ने निर्दलीय द्वारा मिली कांटे की टक्कर के बावजूद जीत दर्ज की । यहां ये भी विदित हो कि चाहे पीएल हिमानी हो या हरिमोहन नेगी दोनों ही कांग्रेस के टिकट पर या यों कहें कि कांग्रेस के समर्थन से चुनाव जीते हैं । दोनों ही चुनावो में कद्दावर नेताओं की भरमार के बावजूद भाजपा बुरी तरह से चुनाव हारी है । अब हम बात करते हैं कि रंवाई की मशहूर कहावत "बोता बिराऊ मूसे न मारद" कैसे भाजपा नेताओं पर फिट बैठती है । इसका ज्वलंत उदाहरण लोकसभा चुनाव में पुरोला विधानसभा से भाजपा नेताओं के खिलाफ उठी खतरनाक लहर को आप सभी ने देखा व महसूस किया है । पुरोला विधानसभा से उठी भाजपा नेताओं के खिलाफ खतरनाक लहर का असर इतना व्यापक था कि उत्तरकाशी जनपद में तो भाजपा बुरी तरह पिछडी पर इसका असर पड़ोस की चकराता विधानसभा में भी व्यापक रूप से देखा गया । अब सवाल ये हैं की एक तरफ पुरोला विधानसभा में चल रहे सदस्यता अभियान के क्रम में पुरोला के मतदाताओं का लगभग अभीतक 80% भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुका है बावजूद भाजपा के नेताओं के खिलाफ आम जनता का आक्रोश कायम है । एकबार ये भी जान लेते हैं कि वो कौन नेता हैं जिनके नेतृत्व में भाजपा ने लोकसभा चुनाव लड़ा था, पहला नाम है विधायक दुर्गेश्वर लाल का , दूसरा नाम पूर्व विधायक मालचंद, तीसरा नाम पूर्व विधायक राजेश जुवांठा, चौथा नाम पूर्व विधायक राजकुमार, पांचवे है पूर्व जिलाध्यक्ष रमेश चौहान, छठे है पूर्व जिलाध्यक्ष जगत चौहान व सातवे महारथी है पूर्व जिलाध्यक्ष श्याम डोभाल ।
खैर आप सभी ने देखा कि लोकसभा चुनावों में इनमेसे कुछ नेताओं के खिलाफ आक्रोश था जिसकी बानगी चुनाव परिणाम में इसका असर व्यापक था ।
अब बात करते हैं नगर पालिका चुनाव में अभीतक मिली करारी हार का तो इसका प्रमुख कारण भाजपा नेताओं द्वारा मतदाताओं को बन्दूवा मजदूर समझने की सोच है । भाजपा नेताओं की आपसी बातचीत में सिर्फ गैरोला भाईसाहब का जिक्र होता है, उन्हें लगता हैं कि गैरोला भाईसाहब खुश होंगे तो आपका टिकट पक्का है । गैरोला भाईसाहब की कृपा रही तो आप मण्डल अध्यक्ष बन सकते हैं आप जिले में कही भी मंनोनित पदाधिकारी बन सकते हैं । यही कारण है जिसने भाजपा नेताओं को आम जनता से दूर कर दिया है ।
भाजपा नेताओं से जनता की दूरी का दूसरा प्रमुख कारण है संसाधनों पर चंद नेताओं का कब्जा । जिला योजना हो या सांसद निधि या हो विधायक निधि ये सिर्फ चंद नेताओं के घर , खलिहान व खेतो में नजर आती है । भाजपा के 5-6 नेताओं का विकास यहां के हर भाजपा कार्यकर्ता की जुबान पर होता है व वे हर चुनाव में इसका प्रतिकार भाजपा प्रत्याशी को हराकर करते हैं ।
राजनीतिक विश्लेषण अभी अपडेट हो रहा है 

अस्वीकरण:- उपरोक्त विश्लेषण किसी भी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नही है ओर न किसी को महिमामंडन करने के उद्देश्य से लिखा गया है । उपरोक्त तथ्यों आमजनों के बीच होने वाली चर्चा के आधार पर लिखा गया है व इस लेख को किसी के प्रचार या दुष्प्रचार करने के उद्देश्य से नही लिखा गया है ।

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