गगन मंडल और भू-धरा, आज रही चित्कार।
बदल रहा है स्वरूप उसका, बना विकट विकराल।
परिस्थिति विषम बनी आज, हुआ विमर्श योग्य विचार।
धरा कुंठित चीख रही, बोलो कौन है जिम्मेदार।।
ईश्वर तो है परमपिता, छत्रछाया अपनी दी अपार।
पर मां की कमी का एहसास,उसे सताता बार-बार।
भेज प्रकृति को मृत्यु लोक में, दिया हमें अमूल्य उपहार।
हवा, पानी, फल, फूल,और दृश्य प्राकृतिक मनोहर।
किया आदेशित, मां बन तुम लुटाओ प्रेम अपार।
हुई हर्षित प्रकृति भी, आदेश हुआ स्वीकार।।
युगों युगों से था व्यवस्थित, सुखमय यह संसार।
तभी अचानक बदली काया, स्वार्थी हुआ मानव व्यवहार।
अनधड़ दोहन किया प्रकृति का, भूल गया उपकार।
लालच व प्रतिस्पर्धा के वशीभूत, किया विनाश अपार।
सरल, शांत रही मां धरती, सहती रही वार पर वार।
ममतामयी स्वभाव के आगे, दब गई उसकी क्रंद पुकार।।
जब हुआ अति प्रकृति हनन, और बढ़ गया पापाचार।
समक्ष रखे कई उदाहरण, ताकि चेत सके इंसान।
इस बहाने चेताया उसने, लगाने को दोहन पर विराम।
भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, सूखा, और ज्वालामुखी अंगार।
जिस आंचल का दूध पिया,उसी वक्ष को रौंदा तमाम।
परंतु समझ ना पाया मानव,बुद्धि में था लालच अपार।।
अति की इति तो होनी ही थी, कब तक चलता यह कारोबार।
विकास सोच जो तू कर रहा, था वह विनाश का प्रचार।
इंसान भूल गया हस्ती अपनी, स्वयं को बना लिया करतार।
याद दिलाया अब ईश्वर ने,ऊपरी सत्ता नहीं लाचार।
कर्मों के बही खाते का, होगा यही मोलभाव।
पाप गठरिया सर पर लादे, कैसे मिले मोक्ष का द्वार।।
नियम प्रकृति का अटल रहा, वह करती सदा परोपकार।
लौटाया उसने हमें हमेशा, एक का दो और दो का चार।
खनिज संपदा जो मिली धरती से, किया प्रबल व्यापार।
सीमा में रहकर होता यह सब, तो समय ना होता विकराल
परिस्थिति जो यह बनी आज है, इसका मानव ही सरताज।
तभी तो मुंह छुपा रखा है, जब पड़ी सर पर वक्त की मार।।
दसों दिशाएं, चारों पहर, सूर्य, चंद्र, तारे तमाम।
जीव, जंतु, कीट, पक्षी, धर्म, सत्य मौसम और विज्ञान।
सभी अड़े हैं विरुद्ध तेरे, लिए प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रमाण।
चीख चीख बता रहे सब, मानव स्वयं है जिम्मेदार।।
कवियत्री छाया चंद (मुनाकोट, पिथौरागढ़ )
शिक्षा : एमएससी नर्सिंग

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