पुरोला, अति प्रचीन धर्म स्थल शिरगुल महाराज मन्दिर पुनर्निर्माण को लेकर पंडित गुरुप्रसाद उनियाल ने शिरगुल महाराज में आस्था रखने वाले सभी अनुयायियों से मन्दिर निर्माण में बढ़चढ़कर योगदान देने की अपील की ।
उन्होंने कहा कि शिरगुल महाराज क्षेत्र के आराध्य देवता हैं व आज की जरूरतों के अनुसार ही पुनर्निर्माण किया जा रहा है ।
उन्होंने कहा कि वर्तमान मन्दिर जीर्ण अवस्था मे होने की वजह से पुरोला में शिरगुल महाराज विगत कई दसको से बिराजमान नही हुए हैं, उन्होंने कहा कि की मन्दिर का पुनर्निर्माण हो ये महाराज की भी इच्छा है व जनभावनाओं के अनुरूप भी है ।
उन्होंने कहा कि शिरगुल महाराज की छत्र छाया का वृतांत व महिमा अपार है जिसके उदाहरण क्षेत्र के जंगलों में स्थान -स्थान पर स्थापित शिरगुल महाराज के खम्बे खुद बयां करते हैं ।
उन्होंने कहा कि राचु, ऋंगाली, साडा व भाष्वा के जंगलों में इन्ही खम्बो की छत्र छाया में लोग निडर होकर विचरण करते हैं , आज उनके प्राचीन मंदिर के पुनर्निर्माण में बढ़चढ़कर योगदान देने का वक्त आ गया है, इसलिए सभी अनुयायी अपना योगदान इस भव्य मन्दिर निर्माण में दे ।
शिरगुल महाराज मन्दिर प्रांगण में अति प्राचीन सेमल व खडीक के पेड़ ।
पुरोला स्तिथ शिरगुल महाराज मन्दिर जितना प्राचीन है उतने ही प्राचीन प्रांगण में स्तिथ सेमल व खडीक के पेड़ है, वही मन्दिर से सटे खडीक के पेड़ की भक्तजन सदियों से पूजा करते आ रहे हैं ।
सरूका में देहरादून व उत्तरकाशी की सीमा में घनघोर जंगल मे है महाराज का तीर्थ स्थल
पुरोला के कूफारा गांव से 4 किमी के पैदल दूरी तय करके देवदार व बांझ के घने जंगलों के बीच स्थिति मन्दिर महाराज के अनुयायियों की आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है, घनघोर जंगल मे होने के बावजूद बनाग्नि आज तक मन्दिर को छू भी नही पाई है, इसी मंदिर परिसर में हैं महाराज की दिव्य ओखली । इस ओखली की महिमा अपरंपार है इसमें है दिव्य जल स्रोत जो न कभी घटता है ओर न घटता है , मन्दिर में बैसाख के महीने में लगने वाले मेले में आने वाले हजारों श्रद्धालुओं को इसी ओखली से पानी मिलता है जिससे सभी के लिए खाना भी तैयार होता हैं ।

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