मुस्लिमो के प्रति बढ़ती नफरत की बजह क्या है

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इस लेख के लेखक आर पी विशाल है जो एक प्रगतिशील लेखक हैं व समाज मे फैली कुरीतियों के खिलाफ लड़ रहे है। यार आलेख उनके व्हाट्सएप मेसेज से लिया गया है ।

Amazon offer upto 70% discount through this link, please click and know your offer मुसलमानों के प्रति एक नफरती नजरिया बन चुका है इसमें केवल कुछ उच्च वर्णीय हिन्दू ही नहीं बल्कि दलित, आदिवासी, पिछड़े जैसे हाशिये के शोषित, वंचित अथवा प्रताड़ित हिन्दू भी सबसे आगे मिलते हैं। इसके अलावा कुछेक अपवाद छोड़कर सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि समुदाय भी मुस्लिमों पर भरोसा करने में कमजोर है। यदि आप इसे भारतीय परिपेक्ष में व राजनीति, धार्मिक या सामाजिक दृष्टिकोण में देख रहे हैं तो आप गलती कर रहे हैं। आपको सबसे पहले यह देखना है कि अमेरिका, इजरायल, इंग्लैंड आदि देशों में भी राष्ट्रवादी सरकारें जीती है और उनके एजेंडे में भी मुस्लिम अवश्य ही रहे हैं। इसके अलावा श्रीलंका, म्यांमार चीन जैसे देशों में भी मुस्लिम समुदाय पर केवल हमले ही नहीं बढ़े हैं बल्कि नजरिया भी नफरती भरा ही रहा है।

इसको गहराई से समझना होगा कि ऐसी स्थितियां क्यों बनी है? ख़ासकर मुस्लिम पृष्टभूमि के अग्रणी अधिनायकों, आम जनमानसव प्रतिनिधियों को इस विषय पर बड़े आत्ममंथन की आवश्यकता है। पहले धार्मिक पहचान से पनपी कट्टरता को समझें। इसके कुछेक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

पहला आरोप जो मुसलमानों पर आसानी से लगाया जाता रहा है वह है धर्म के प्रति कट्टरता। कट्टरतावादी विचारों ने एक समय मे इस धर्म को फैलने में अवश्य मदद की लेकिन आज यही विचार समस्या बन गया है। साम्प्रदायिक (communal) और धर्मनिरपेक्षता (secular) में जब धर्मनिरपेक्षता को प्राथमिकता दी जाती है तब मुस्लिम धर्मनिरपेक्षता पूर्णतः फेल हो जाती है। किसी भी देश में जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हुए वहां धर्मनिरपेक्षता की बजाय साम्प्रदायिक राष्ट्र को महत्व मिला हालांकि इससे सबसे अधिक प्रभावित खुद मुस्लिम ही हुए खासकर महिलाएं, प्रगतिशील विचारक और स्वतंत्र नागरिकों को धार्मिक कट्टरपन से सीमित बनाया गया। लेकिन बावजूद इसके आम मुस्लिम और आम गैर मुस्लिम में उतनी एकता नहीं बन सकी जितनी बन सकती थी।

धर्मनिरपेक्षता को ऐसे समझें कि दो व्यक्ति आपस मे खास दोस्त हैं। धर्म से एक हिन्दू, दूसरा मुस्लिम है। दोनों एकसाथ खाते, पीते और रहते भी हैं। दोनों के मन मे एकदूसरे के प्रति दूर दूर तक नफरत, अलगाव, भेदभाव का कोई नामोनिशान नहीं है। एकदिन दोनों महफ़िल सजाने की ठान लेते हैं। चिकन पार्टी का आयोजन निश्चय हुआ। अब मुस्लिम व्यक्ति शर्त रखता है कि मैँ चिकन तभी खाऊंगा जब वह हलाल का होगा अन्यथा नहीं खाऊंगा। आप उसे उसूल कहें या कट्टरपन मगर एक गैर मुस्लिम अथवा हिन्दू के मन में सवाल उठ खड़ा हुआ कि मेरा सेक्युलर मुझे हलाल खाने के लिए प्रेरित भी कर रहा और धर्म मुझे बाधित भी नहीं कर मगर उसका सेक्युलर उसे झटका खाने की इजाज़त नहीं देता है ऐसा कैसा सेक्युलर?

आप कहेंगे कि कुरान में स्पष्ट लिखा है कि कितने तरह का मांस नहीं खाना चाहिए और क्यों नहीं खाना उसको पहले पढ़ना और समझना होगा। यह वही बात हो गई जैसे हिन्दू कोई हिन्दू कहे कि मैं मंगलबार को मांस नहीं खाता हूँ यह मेरा धर्म मुझे इजाजत नहीं देता है। हो सकता है दोनों अपनी अपनी जगह सही हों मगर सवाल यह है कि जब आप खाते हो तब उल्टा काटो या सीधा, मंगलवार को खाओ या सोमवार को पहली बात तो यह कि ये सब केवल अंधविश्वास के ढकोसले हैं। दूसरी बात यह कि मुर्गा वही है, पेट भी वही है, मुर्गे की जान भी चली गई है और आपको चटकारे भी लेने हैं तो धर्म को विषय मत बनाओ। झटका खाओ या हलाल फर्क सोच का है धर्म वजह है।

अब वापस विषय पर आता हूँ मुस्लिम का धर्मनिरपेक्ष। जब एक हिन्दू व्यक्ति हलाल का मांस खाने को राजी है और एक मुस्लिम व्यक्ति झटका मांस खाने को कतई तैयार नहीं तब सवाल यही है कि मैँ ही धर्मनिरपेक्ष क्यों बनूँ? और देखा जाय तो सवाल वाजिब भी है। कुछ धार्मिक अंधभक्त यहां भी तर्क देते देखे गए कि हमारा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता है इसलिए हर कर्म अपना करेंगे "ऐ वतन तेरे लिए" चिकन न खाने से क्या दोस्ती या नियत पर सवाल किए जा सकते हैं? दूसरी बात यह बताइए कि क्या मुर्गा, बकरा, मछली खा सकते हो ऐसे ही गधे, खच्चर, घोड़े आदि क्यों नहीं खाते?

कुछ लोग तो यहीं नहीं रुकते हैं उनका कहना है कि हम शादी दूर क्यों करते हैं अपने ही घर क्यों नहीं? लड़की लड़की या लड़के लडके में जो यह भेद है यह कुछ समाज और धर्म के नियम होते हैं जिन्हें समझना जरूरी है। मैँ उन्हें धार्मिक अंधे ही कहता हूँ क्योंकि विज्ञान कहता है कि अपने खून के रिश्ते में शादी नहीं करनी चाहिए इससे मनुष्य के जीन में समस्याएं होती है। और समान जीन में आकर्षण भी नहीं होता है। इसलिए हम अलग जीन पर आकर्षित होते हैं। इसके अलावा घोड़े, गधे खाने की बात तो इसके लिए शर्त कुछ नहीं बस मनुष्य का पाचन ने कुछ खाने व कुछ न खाने का वर्गीकरण अपनी सहूलियत के अनुसार किया हुआ है।

यह चिकन का उदाहरण केवल एक नमूना है यह समझने के लिए कि एकता के लिए बाध्यकारी क्या चीजें हैं और क्यों। ऐसे हजारों कारण है जिससे मुस्लिम समुदाय निशाने पर रहे हैं जैसे यदि वे साम्प्रदायिक चीजों को परिभाषित करते हैं तो उन्हें धर्मनिरपेक्षता में यह भेदभाव झेलना पड़ेगा इसके लिए वे खुद ज्यादा जिम्मेदार हैं। हालांकि प्रगतिशील मुस्लिम व नास्तिक लोग उस श्रेणी से बाहर हैं। मुसलमानों को यह समझना जरूरी है कि उनके खिलाफ विश्व में जो एक नजरिया स्थापित हुआ उसमें ऐसी छोटी छोटी बातें ही समाहित हैं। वह चाहे पहनावा हों, खानपान हो, इबादत हो या फिर विचारधारा हों। यदि आपके समाज में प्रगतिवादी लोग जो मुस्लिम होकर भी अलग पहचान नहीं रखते हैं इसके बावजूद उनका धर्म सुरक्षित हैं तो आप जो धर्म के कट्टर समर्थक या अनुसरणकर्ता हैं आपके सोचने व बदलने का यह सही वक्त है।

आप इंडिया गेट में नमाज पढ़ते हुए प्रदर्शन करते हैं तो आपको यह समझना होगा कि इंडिया गेट में कोई हिन्दू या अन्य धर्म को मानने वाला अथवा आस्तिक व्यक्ति हवन, यज्ञ का विरोध कैसे कर सकता है? हवन यज्ञ यदि हमारे लिए ढोंग है तो नमाज, अज़ान भी हमारे लिए ढोंग की श्रेणी में ही है। जिसे धर्म मानना है अवश्य माने, संविधान इजाजत देता है इसकी मगर अपने घर के अंदर माने तो आप सबका धर्म ज्यादा सुरक्षित रह सकेगा। मेरी पोस्ट को आप तभी समझ सकोगे जब विषयवस्तु पर ध्यान केंद्रित होगा अन्यथा आपके लिए यह विरोधी बातों से अधिक कुछ नहीं है।

एक और विषय जिससे मुसलमानों को सबसे अधिक जूझना पड़ा वह है इस्लामिक आतंकवाद पर चुप्पी। यह किसी से नहीं छुपा है कि विश्व में आतंकवाद का जो क्रूर चेहरा है उन्होंने इस्लाम को आधार बनाकर दुनिया को डराने का काम किया है जैसे ओसामा बिन लादेन और बगदादी जैसे लोग। आम मुस्लिम भले ही इसपर अपने विरोध प्रकट करते रहे मगर इस्लामिक राष्ट्र इसपर एक शब्द नहीं बोले। कई राष्ट्रों ने उन्हें संरक्षण देने का भी काम किया जिसमें पाकिस्तान प्रमुख था। पाकिस्तान भारत का एक स्थाई और कट्टर दुश्मन है। भारत के मुस्लिम नेतृत्व ने पाकिस्तान, आतंकवाद, राष्ट्रवाद आदि पर उतना नहीं बोला जितनी शायद जरूरत थी। यहां मुस्लिम बहुल क्षेत्र में दो लोगों के बीच के झगड़े भी धार्मिक रंग ले लेते हैं जबकि बाकियों के बीच इतना नहीं होता है।

आज मैँ यह पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मैंने मुसलमानों के समर्थन में हमेशा लिखा है। हर साम्प्रदायिक मुददे पर मैँ मुस्लिम समुदाय के साथ खड़ा हूँ। धर्मनिरपेक्षता मेरा पहला विषय है लेकिन मेरी धर्मनिरपेक्षता यह उम्मीद करती है कि आपकी व मेरी धर्मनिरपेक्षता एक ही हो। मुसलमानों के पक्ष में लिखने पर दलित समुदाय तक नाक भौहें सिकुड़ लेता है जिन्हें भारत में आज भी दोयम दर्जे का इंसान माना जाता है। जिन्हें मुस्लिम भले ही स्वीकार करे मगर उच्च वर्णीय हिन्दू दलितों को दलितों से अधिक कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकेगा वे दलित, आदिवासी पिछड़े भी मुस्लिम से एकता पर एकमत नहीं हैं। इस सोचनीय विषय मुसलमानों के लिए है।

किसी भी क्षेत्र, शहर, विधालय, संस्थान आदि में मुस्लिम प्रतीक के पहनावे ज्यादा मिलते हैं। आपको समझना होगा कि अमित शाह जी और आजम खान जी दोनों दो धर्मों के नेता है मगर धर्म के प्रतिनिधि नहीं है। योगी आदित्यनाथ जी और अकबरुद्दीन ओवैसी जी दोनों अपने कपड़ों से ही अपने धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि अपना अपना पक्ष तो दोनों मजबूती से रखेंगे लेकिन एकदूसरे से समस्या भी होगी और खतरा भी। इसी तरह जब किसी सेक्युलर देश के किसी सरकारी संस्थान में पढ़ने वाले बच्चे यदि धार्मिक वेशभूषा धारण करके आते हैं तो धारण करने वाले इंसान की कट्टरतावादी सोच ज्यादा उजागर होती है। जैसे कि कोई बुर्का, हिजाब, नकाब, दाड़ी, छोटी आदि का प्रदर्शन करता है।

उर्दू के एक मशहूर शायर ने लिखा है कि मुझे हिन्दू और मुस्लिमों से आपत्ति नहीं है मुझे तो दादी और चोटी वालों से डर लगता है। धर्म और धर्म का सार्वजनिक प्रतिनिधित्व करने वाले इन तमाम लोगों से आम जनमानस को आपत्ति है और इसका खामियाजा आम इंसान को भुगतना पड़ता है। मैंने बुरखा (बुर्का) नकाब, पर्दा आदि प्रथा पर पहले भी लेख लिखे हैं लेकिन धार्मिक अंधसमर्थक वहां यह कहते हुए पाए गए कि जिन्हें अंगप्रदर्शन का शौक हो करे हीरा हमेशा छुपाकर रखा जाता है। उनकी नज़र में साड़ी, सूट, जीन्स आदि पहनने वाली महिलाएं असभ्य और नग्न लगती है। इन्ही सोच की वजह से भी आज यह साम्प्रदायिकता बड़ी है।

भारत के प्रसिद्ध लेखक राहुल सांकृत्यायन ने ठीक ही कहा कि "जिसने लिखा है कि धर्म नहीं सीखाता आपस मे बैर करना उसने झूठ कहा है। सारे फसाद की जड़ यह धर्म ही है"  इसका खामियाजा हर उस व्यक्ति को भुगतना पड़ेगा जो धर्म को लेकर कट्टर होते जाएगा। आज इंसान धर्म के लिए एक दूसरे को मार रहा है जबकि समय है कि सब धर्मों को समेटकर इंसान को बचाया जाय। इंसान बनेंगे तो बाकि कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को एक करने की आवश्यकता है, धार्मिक प्रतीक, आस्था, पहनावा सब घर तक ही ठीक लगते हैं। बाकि जमाने के साथ चलो धर्म के साथ नहीं। जरूरत है धर्म और सोच को अपडेट करने की, कट्टर करने की नहीं।पोस्ट पूरी पढ़ने के लिए धन्यबाद। विचार ठीक लगे तो आगे शेयर करते चलें।

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