बाजार के जमाने में डाक्टर नरेन्द्र होना
2 जून 2017 को उत्तराखंड के त्यूनी कस्बे से शाम के वक्त एक सवारी जीप बगूर गाँव के लिए रवाना होती है और ओवरलोड के चलते रास्ते मे दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। इस दुर्घटना में 6 लोग मारे जाते हैं और कुछ मामूली तो कुछ गंभीर रूप से घायल हो जाते है। घायलों मृतकों को आनन फानन में नजदीकी अस्पताल त्यूनी लाया जाता है लेकिन वहाँ कोई डाक्टर मौजूद नहीं होता।
उसके अगले दिन यानी कि 3 जून को बावर ईलाके में जखोली का मेला है और इस मेले में शामिल होने के लिए बृनाड़ गाँव का डाक्टर नरेन्द्र छुट्टी लेकर उसी शाम अपने गाँव पहुँचा होता है लेकिन दुर्घटना की खबर सुनकर वह बिना देर किए तुरत त्यूनी के सरकारी अस्पताल के लिए रवाना हो जाता है।
2 जून 2017 की उस काली रात को डाक्टर नरेन्द्र घायलों के ईलाज मे जुट जाता है। वह मामूली रूप से घायलों की जांच पडताल और मरहम पट्टी कर उन्हे घर भेज देता है। कुछ घायलों को, जो खतरे से बाहर है लेकिन जिन्हे इलाज की सख्त दरकार है, उन्हे अपनी देख रेख में अस्पताल के वार्ड में भरती कर उनका जरूरी इलाज शुरू कर देता है और गंभीर रूप से घायलों को फौरी जीवन रक्षक चिकित्सा उपलब्ध करवाकर उन्हे देहरादून के लिए रेफर कर देता है। यही नही, वह इस दुर्घटना के मृतकों की लाशे मोर्चरी में पडी न रह जाए, लगे हाथ उनका पोस्टमार्टम कर उन्हे जरूरी सरकारी कार्यवाही के बाद उनके रिश्तेदारों के सुपुर्द करवा देता है।
डाक्टर नरेन्द्र जौनसार बावर के लिए कोई अपरिचित नाम नहीं है। जौनसार बावर और आस पास के इलाकों में आपको हारी बीमारी से पीड़ित लोगो से ऐसे कितने ही सुखद किस्से सुनने को मिल जाएंगे जो डाक्टर नरेन्द्र को मानवीय सेवाओं के क्षेत्र में एक अलग मुकाम पर खडा करता है। विकास नगर के सरकारी अस्पताल मे रहते हुए डाक्टर नरेन्द्र ने पूरे इलाके के लोगो के बीच अपनी जो साख बनाई, वह अपने आप मे एक नजीर है। केवल इसलिए नहीं कि वो अस्पताल में आए मरीजों का इलाज करता है। यह तो हर तनखैये डाक्टर का फर्ज होता है लेकिन डाक्टर नरेन्द्र को जो बात खास बनाती है वह है उसका मरीजों और उनके तीमारदारों को अस्पताल से बाहर भी मदद करना।
डाक्टर नरेन्द्र के घर में आपको एक भी डिनर सेट पूरा नहीं मिलेगा। किसी की तश्तरियां, कटोरियां नहीं है तो किसी से प्याले गिलास गायब है। यही हाल कपड़ों का है। घर में लाए गये दरी कंबल महीने भर नही टिक पाते। उस से पहले ही उनके सामने कोई न कोई जरूरतमंद सामने खड़ा हो जाता था। पहाड़ से तीमारदार अपने मरीज को लेकर विकास नगर के सरकारी अस्पताल तो पहुँच जाते है लेकिन वे हड़बड़ाहट की हालत में मरीज को पानी पिलाने और खाना खिलाने के लिए साथ मे बर्तन नही ला पाते है। बहुत से तीमारदारों के पास ओढ़ने बिछाने के लिए भी कुछ नही होता । ऐसे में जब वे डाक्टर नरेन्द्र से अपनी परेशानी बताते तो डाक्टर नरेन्द्र उन्हे बाजार से खरीदने की सलाह देने की बजाय अपने घर से जरूरत भर बर्तन कपड़े उन्हे मुहैया करवा देते। यही नहीं, कितने ही गरीब लोग अपने मरीज को जैसे तैसे अस्पताल तो ले आते लेकिन पल्ले मे पैसा न होने के कारण दवा नही खरीद पाते। डाक्टर नरेन्द्र पहाड़ से हारी बीमारी की हालत में उतरे अपने इन लोगों की माली हालात को बखूबी जानते और समझते है। वे जितना बन पड़ता रूपये पैसे से भी उनकी मदद करते। ऐसे समय मे जब डाक्टर का पेशा केवल और केवल पैसा कमाने का जरिया हो तो उसी दौरान डाक्टर नरेन्द्र जैसे शख्स का होना कितना सुखद महसूस होता है।
हाल के दौरान सुनने मे आया कि डाक्टर नरेन्द्र का जिले से बाहर स्थांतरित कर दिया गया है। सरकारी नौकरी में स्थांतरण का कोई न कोई कारण होता है। मसलन् ड्यूटी के प्रति लापरवाही, कोई शिकायत या फिर गबन का आरोप, लेकिन डाक्टर नरेन्द्र का तो दूर दूर तक ऐसी किसी बात से कभी कोई कोई सबंध ही नही रहा। ऐसे में सरकार की यह मजबूरी समझ से परे है।
नवक्रान्ति संगठन ने डॉक्टर नरेन्द्र का तबादला निरस्त किये जाने की मांग की है, संगठन के महासचिव एडवोकेट गम्भीर चौहान ने सरकार से जनता के लिए काम करने वाले जनसेवकों को पुरस्कार के स्थान पर तबादला ना करने की अपील की ।
2 जून 2017 को उत्तराखंड के त्यूनी कस्बे से शाम के वक्त एक सवारी जीप बगूर गाँव के लिए रवाना होती है और ओवरलोड के चलते रास्ते मे दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। इस दुर्घटना में 6 लोग मारे जाते हैं और कुछ मामूली तो कुछ गंभीर रूप से घायल हो जाते है। घायलों मृतकों को आनन फानन में नजदीकी अस्पताल त्यूनी लाया जाता है लेकिन वहाँ कोई डाक्टर मौजूद नहीं होता।
उसके अगले दिन यानी कि 3 जून को बावर ईलाके में जखोली का मेला है और इस मेले में शामिल होने के लिए बृनाड़ गाँव का डाक्टर नरेन्द्र छुट्टी लेकर उसी शाम अपने गाँव पहुँचा होता है लेकिन दुर्घटना की खबर सुनकर वह बिना देर किए तुरत त्यूनी के सरकारी अस्पताल के लिए रवाना हो जाता है।
2 जून 2017 की उस काली रात को डाक्टर नरेन्द्र घायलों के ईलाज मे जुट जाता है। वह मामूली रूप से घायलों की जांच पडताल और मरहम पट्टी कर उन्हे घर भेज देता है। कुछ घायलों को, जो खतरे से बाहर है लेकिन जिन्हे इलाज की सख्त दरकार है, उन्हे अपनी देख रेख में अस्पताल के वार्ड में भरती कर उनका जरूरी इलाज शुरू कर देता है और गंभीर रूप से घायलों को फौरी जीवन रक्षक चिकित्सा उपलब्ध करवाकर उन्हे देहरादून के लिए रेफर कर देता है। यही नही, वह इस दुर्घटना के मृतकों की लाशे मोर्चरी में पडी न रह जाए, लगे हाथ उनका पोस्टमार्टम कर उन्हे जरूरी सरकारी कार्यवाही के बाद उनके रिश्तेदारों के सुपुर्द करवा देता है।
डाक्टर नरेन्द्र जौनसार बावर के लिए कोई अपरिचित नाम नहीं है। जौनसार बावर और आस पास के इलाकों में आपको हारी बीमारी से पीड़ित लोगो से ऐसे कितने ही सुखद किस्से सुनने को मिल जाएंगे जो डाक्टर नरेन्द्र को मानवीय सेवाओं के क्षेत्र में एक अलग मुकाम पर खडा करता है। विकास नगर के सरकारी अस्पताल मे रहते हुए डाक्टर नरेन्द्र ने पूरे इलाके के लोगो के बीच अपनी जो साख बनाई, वह अपने आप मे एक नजीर है। केवल इसलिए नहीं कि वो अस्पताल में आए मरीजों का इलाज करता है। यह तो हर तनखैये डाक्टर का फर्ज होता है लेकिन डाक्टर नरेन्द्र को जो बात खास बनाती है वह है उसका मरीजों और उनके तीमारदारों को अस्पताल से बाहर भी मदद करना।
डाक्टर नरेन्द्र के घर में आपको एक भी डिनर सेट पूरा नहीं मिलेगा। किसी की तश्तरियां, कटोरियां नहीं है तो किसी से प्याले गिलास गायब है। यही हाल कपड़ों का है। घर में लाए गये दरी कंबल महीने भर नही टिक पाते। उस से पहले ही उनके सामने कोई न कोई जरूरतमंद सामने खड़ा हो जाता था। पहाड़ से तीमारदार अपने मरीज को लेकर विकास नगर के सरकारी अस्पताल तो पहुँच जाते है लेकिन वे हड़बड़ाहट की हालत में मरीज को पानी पिलाने और खाना खिलाने के लिए साथ मे बर्तन नही ला पाते है। बहुत से तीमारदारों के पास ओढ़ने बिछाने के लिए भी कुछ नही होता । ऐसे में जब वे डाक्टर नरेन्द्र से अपनी परेशानी बताते तो डाक्टर नरेन्द्र उन्हे बाजार से खरीदने की सलाह देने की बजाय अपने घर से जरूरत भर बर्तन कपड़े उन्हे मुहैया करवा देते। यही नहीं, कितने ही गरीब लोग अपने मरीज को जैसे तैसे अस्पताल तो ले आते लेकिन पल्ले मे पैसा न होने के कारण दवा नही खरीद पाते। डाक्टर नरेन्द्र पहाड़ से हारी बीमारी की हालत में उतरे अपने इन लोगों की माली हालात को बखूबी जानते और समझते है। वे जितना बन पड़ता रूपये पैसे से भी उनकी मदद करते। ऐसे समय मे जब डाक्टर का पेशा केवल और केवल पैसा कमाने का जरिया हो तो उसी दौरान डाक्टर नरेन्द्र जैसे शख्स का होना कितना सुखद महसूस होता है।
हाल के दौरान सुनने मे आया कि डाक्टर नरेन्द्र का जिले से बाहर स्थांतरित कर दिया गया है। सरकारी नौकरी में स्थांतरण का कोई न कोई कारण होता है। मसलन् ड्यूटी के प्रति लापरवाही, कोई शिकायत या फिर गबन का आरोप, लेकिन डाक्टर नरेन्द्र का तो दूर दूर तक ऐसी किसी बात से कभी कोई कोई सबंध ही नही रहा। ऐसे में सरकार की यह मजबूरी समझ से परे है।
नवक्रान्ति संगठन ने डॉक्टर नरेन्द्र का तबादला निरस्त किये जाने की मांग की है, संगठन के महासचिव एडवोकेट गम्भीर चौहान ने सरकार से जनता के लिए काम करने वाले जनसेवकों को पुरस्कार के स्थान पर तबादला ना करने की अपील की ।

0 टिप्पणियाँ