गजेन्द्र सिंह चौहान, पुरोला
राजनीतिक सह मात के खेल में उत्तरकाशी जनपद में भाजपा का सुपड़ा साफ होते लोकसभा चुनाव में सबने देखा । बावजूद भाजपा के नीति निर्धारकों ने सबक नहीं सिखा । यहां ये भी जानना जरूरी है कि जनपद उत्तरकाशी में भाजपा की करारी हार के पीछे पुरोला विधानसभा में कार्यकर्ताओं में उत्पन व्यापक आक्रोश था । किंतु भाजपा हाइकमान ने इसे मात्र रानी के खिलाफ असंतोष मान हार की जिम्मेदारी लेना मुनासिब नहीं समझा। ये भी जानना जरूरी है कि अगर असंतोष रानी के खिलाफ था तो रानी जीती कैसे । चुनाव के परिणाम से स्पष्ट हो गया था कि असंतोष रानी के खिलाफ नहीं था अपितु कार्यकर्ताओं की व्यापक अनदेखी इसका प्रमुख कारण था।
खैर लोकसभा चुनाव के नतीजों से सिख न लेकर कार्यकर्ताओं की अनदेखी का सिलसिला अनवरत जारी रहा। मात्र अनदेखी ही असंतोष की प्रमुख वजह नहीं है अपितु सड़क निर्माण से लेकर नदी नालों में चल रहे विनाश कार्यों के सभी ठेकों में कांग्रेसियों की बड़ी हिस्सेदारी सबसे बड़ी वजह है।
विगत तीन वर्षों में भाजपा ने कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक में बड़ी सेंध मारते हुए कथित दलित मोर्चे पर शत प्रतिशत ध्यान लगाया । किंतु कथित दलित मोर्चे पर पूरा ध्यान केंद्रित करने की वजह से भाजपा अपने परम्परागत वोट बैंक को भूल गई व उन्हें बंधुआ वोटर समझ बैठी।
कथित दलित मोर्चे पर शत प्रतिशत ध्यान देने से वास्तविक दलितों का बीजेपी से मोहभंग हो गया व उन्हें कांग्रेस की ओर लौटना पड़ा। वहीं एक तरफ कथित दलित मोर्चे ने निकाय चुनाव की रणभेरी बजते ही खुलकर कांग्रेस को समर्थन दे दिया व दूसरी तरफ पार्टी का परम्परागत वोट बैंक पहले से नाराज बैठा हुआ है ।
एक तरफ तो भाजपा पर माया मिली न राम की कहावत चरितार्थ हो रही है वही लोकल कहावत अब खा माछ कि सलाह भाजपा पदाधिकारियों को सुननी पड रहीं है, जिसका शाब्दिक अर्थ अब मछली खालों ।

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