पूर्व विधायक मालचंद की पुरोला की राजनीति में अनुपस्थिति के क्या है मायने ।

 गजेन्द्र सिंह चौहान, पुरोला

 पुरोला में एक कहावत हर जुबां पर अकसर सुनी जाती है , जब तक उगेगा आलू तब तक रहेगा मालू ।

दो बार पुरोला के विधायक रहे मालचंद की चर्चा विरोधियों व समर्थकों के बीच हमेशा होती रहती है । कारण मालचंद का सरल स्वभाव हर किसी को उनसे जोड़े रहता है चाहे वो उनका धुर विरोधी ही क्यो न हो ।


मालचंद को दो बार पुरोला की जनता ने विधानसभा में भेजकर उन्हें यहां का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया है । ऐसे में उनके खिलाफ एक एन्टी इनकंबेंसी हमेशा बनी रहती है । वे 3 बार मामूली अंतर से चुनाव हारे हैं । उन्होंने कभी भी बीजेपी संगठन से अपनी गणित ठीक नही बैठाई जिस कारण वे हर बार संगठन के निशाने पर रहे जो  हर बार उनकी हार का कारण बनी ।

गत चुनाव में संगठन के साथ पटरी ठीक न बैठने के चलते चुनाव से येन पहले उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया जो उनके हार का कारण बन गया ।

विधानसभा चुनाव बीते एक साल हो गया किंतु न तो खुद मालचंद कांग्रेस के अधिकांश कार्यक्रमो में सक्रिय दिखे न उनके खास सहयोगी ।

कयास यही है कि मालचंद जब भी चुनाव जीते बीजेपी के टिकट पर जीते, इसलिए उनके अधिकांश सहयोगी कांग्रेस में अपने को असहज महसूस कर रहे हैं ।

मालचंद का पुरोला विधानसभा में खुद का एक बहुत बड़ा वोट बैंक है जिस कारण वे दो बार जीते हैं ओर हारे भी तो मामूली अंतर से ।

मालचंद के पीछे लामवन्द वोट बैंक को देखते हुए व आसन्न लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी उनसे जरूर सम्पर्क कर सकती है । ये तो भविष्य के गर्त में है कि वे पुनः बीजेपी में जाते हैं या अपनी पीछे लामवन्द समर्थकों के दमपर कांग्रेस को मजबूत करते हैं ।

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