बार -बार यह पंक्तियाँ स्मरण
हो उठती है, "अंधकार से न दहशत ' रात से बिल्कुल न डर 'काल के बश में हैँ ये 'सुबह का इंतज़ार कर "
कोरोना भी काल के बश में है, काल ही सबको नियंत्रित करता है, कोरोना का जब काल आयेगा तो चला जायेगा, मनुष्य इस समय जीवन के सबसे बड़े इम्तहान से गुजर रहा है, यह उसके धैर्य की परीक्षा है!और परीक्षा तो पास तो होना ही है, पिछले वर्ष के 14 महीनों से यह
दुष्ट वायरस डराता, बीमार करता, अस्पतालों की खाक छनाता, ऑक्सीजन के लिए तड़पाता, घर में कैद करवाता, स्वजनों के लिए असीम पीड़ा पहुंचाता, यहाँ तक मृत्यु पर्यन्त दुःख देता आ रहा है!
उत्तराखण्ड के पहाड़ों में अपने आप को कोरोना से बचाने की आवश्यकता है, कोरोना की यह दूसरी लहर जो युवाओं के सबसे घातक मानी जा रही है, पर युवा ही है जो बड़ी से बड़ी चुनौती को स्वीकार कर उससे भीड़ जाते है, वह युवा ही क्या जो चुनौती को स्वीकार न करे, युवा शब्द को
उल्टा करने पर वायु बनता है, और वायु का अर्थ है प्राण वायु, ऑक्सीजन, जीने के लिए सांसे
और उससे ज्यादा वायु तूफ़ान, यही ताकतें उससे सबसे अलग बनाती है!इन्ही कौशलों से उसके जीवन का सृजन होता है, फिर युवाओं को किस बात का भय, इस समय पूरा देश एक अदृश्य
वायरस से लड़ रहा है, यह खामोश युद्ध है, अपनी रणनीति तो बदलनी पड़ेगी, इस समय पहाड़ों के गावों में रह रहे नवजावानों से अपील है कि वे अपने एकजुट विचार से गावों में
व्याप्त कोरोना के भय से बाहर निकालें, भय ही है जो सामान्य मौसमी बुखार, खांसी, जुकाम आदि को कोरोना में तब्दील करवा रहा, भय ही है जो रस्सी को सांप बना देता है, भय ही है जो रात में पेड़ों, झाड़िओ को भय
का भूत बना देता है, यदि हम इस अदृश्य भय से मुक्त हो जाएँ तो हमारी विजय निश्चय ही सफल
होंगी, इसलिए युवाओं को गांव में जागरूकता फैलानी की आवश्कता है, इससे बचाव के तरीके रोज सोशल मीडिया में आते रहते है, बस कमर कसके
जुट जाओ, यही हम सबका कर्तव्य है, धर्म है, और यही संस्कार भी प्रेरित करते है!
नवदीप डोभाल
(बीएससी और डिप्लोमा इन सिविल इंजीनियरिंग)

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