कोरोना की दूसरी लहर

नवदीप डोभाल 

  प्रसिद्ध चितंक, लेखक, साहित्यकार भारतेन्दु ने अपने लेख भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो


सकती है,में लिख गये कि " अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काज ! दास मलूका कह गये सब दाता राम ! यही स्थिति उन सब पर लागू होती है जिन्होंने मास्क पहनना छोड़़कर,सोशल दूरी की धज्जियां उड़ाते कोरोना को दुबारा बुलाने पर आमदा रहे, यह निकम्मापन नहीं तो क्या? जो अपने ,अपने समूह, पार्टी के स्वार्थ के वशीभूत अपने स्वच्छंदता पर आमदा रहे, जैसे ही भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोना वैक्सीन का ईजाद किया, वेसै ही आमजन से प्रभावशाली लोगों ने मास्क पहनने की आदत को तिलांजलि देकर दैनिक आदतों में

शामिल कर लिया, यहां तक कि महिलाएं होठोँ की लिपिस्टिक के प्रदर्शन को ज्यादा महत्व देती कोरोना से बचाव हेतु मास्क के उपयोग से बचने के बहाने ढ़ूंढने लगी।  ऐसी भी क्या विवशता जो अपने और अपने आसपास ,समाज के सेहत की परवाह न करके अपनी आदतों तले बिना बुलाऐ आफत को न्यौता दिया जाय।                       

        कोरोना के बढ़ रहे आंकड़े तकदीश करते है कि दिन प्रतिदिन स्थिति विस्फोटक बन रही है, यह 

स्थिति अत्यंत डराने और चिंतित

करनेवाली है कि आने वाले दिन देश को लाकडाउन की ओर कैद में रहने के लिए विवश होना पड़ सकता है, जिससे व्यवसाय, उद्योग धंधे, रेहड़ी, ठेली,सब्जी

,फल व्यापार आदि सब कारोबार

ठप्प होकर अर्थव्यवस्था को मंदी को धकेल सकता है,कुछ लोगों से तो यह सुनकर हैरान होना पड़ा कि यह तो मोदी का मास्क प्रोपेगैंडा है, चलो भारत में मान लें कि मोदी का मास्क प्रपंच है ,फिर विदेशों में भी मोदी का मास्क बिक्री प्रपंच चला और चलेगा, आपसी ईष्र्या की द्वंदता समाज की तरक्की रोक देती है,

      हलांकि पांच राज्यों में चुनावी रैलियों ,रोड शो पर उमड़ी भीड़

काम्युनिटी स्प्रेड का कारण बन सकती है,जिससें नेता, जनप्रतिनिधि और राजनीतिक पार्टीयों का दोष ही साबित हो रहा है, कुंभ के स्नानों पर हरिद्वार में उमड़ी भीड़ से कोरोना संक्रमण की दूसरी भयावह फैलाव को भी दावत दे बैठी! 

       कोरोना के गतवर्ष की भयावह स्थिति से सबक न लेकर

वर्तमान स्थिति को उत्पन्न करने के दोषी हम सभी है, गतवर्ष लम्बे समय तक रहे इसके प्रभाव के चलते हमे ऐहितियातन इससे बचने से उपायों पर अपनी आदतें अवश्य अपनाने चाहिए, नहीं तो हम कोरोना को खत्म करने के

बजाय यह हमे खत्म करने पर आमदा रहेगा,   

       कोरोना के फैलाव को रोकने

के लिए सरकार की गाईडलाईन

भी भ्रमित करने वाली है कि पचास लाख श्रद्धालुओं का कुंभ

स्नान, चुनावी रैलियों की हजारों भीड़़ में कोरोना का प्रवेश तो मना है,पर अलग अलग स्थानों पर आयोजित की जाने वाली बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाएं, कोचिंग

संस्थानों मे अवश्य कोरोना घुसेगा, जैसे कोरोना सरकारों के निर्देश पर चलेगा, केंद्रीय,राज्य बोर्ड ,प्रतियोगी परीक्षाओं की तिथियाँ स्थगित होने को अवसर में बदलकर तैयारी के लिए अधिक समय के फायदे के रूप में

आत्मसात करना चाहिए, प्रकृति और समय श्रेष्ठ होता है, हर समय

अनूकूल नहीं होता,उसे साधना पड़ता  है, बाहरी गतिविधियां थम 

गयी तो आंतरिक शोध,चिंतन करने से हमे कौन रोक रहा है, यह तो हमारी अपनी ताकत है जिससे 

हम अच्छाई और बुराई दोनोँ हासिल कर सकते है, हम अपने लिए नहीं जी सकते हैं तो पशुओं से गये गुजरे हैं,पशु ,पंछी,कीट ,पतंगे ,पेड़,पौधे यानि समस्त चराचर जगत प्रकृति

के नियमों का पालन करते है, जो प्राकृतिक नियमों से बाहर रहकर उसका उल्लंघन करते है

   कुदरत उसे मिटा देती है, हमारी 

आदते भी कुदरत का एक हिस्सा है, कुदरत से स्वार्थ रखकर जीना जीवन नही  कहलाता, कुदरत से परमार्थ बनाकर जीवन जीना ही

श्रेष्ठता है, यही आत्मसात करने योग्य है, यही जीवन जीने लायक है, यही जीवन हैँ यही स्वर्ग है, यही नर्क है, इससे ऊपर कुछ  नही है


 (लेखक  सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा व विज्ञान में स्नातक है )


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