कोविड 19 का एक पाठ
अपने कॉलेज से हमने पास के एक गांव में एक अभिभावक को कॉल कर के कहा कि हम अपने पूर्व योजना के अनुसार शैक्षिक संवाद में आपके गांव 1 बजे तक आ जाएंगे। आप बच्चों को सूचित कर दें। लेकिन कार्य अधिक होने के कारण हम ढाई बजे दोपहर तक पहुंच सके। बच्चे हमारी राह देख रहे थे। गांव की #थाती# (सार्वजनिक बैठक परिसर) में हम जैसे ही दीवार पर बैठे, हमे दौड़ते हुए एक छात्र दिख। उसने बगल के एक घर से दो कुर्सियां लाई, प्रणाम किया और कहा "बैठो सर"। मैंने अपने प्रधानाचार्य महोदय डॉक्टर बालेश्वर सिंह जी को कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया और मै भी बैठ गया। "कैसे ही बेटा आजाद" (काल्पनिक नाम) उसने सम्मान और स्वाभिमान के साथ उत्तर दिया "जी ठीक हूं"। जब तक हम इधर - उधर देखते प्राथमिक विद्यालय के बच्चे बेहद उत्सुकता से दौड़ दौड़ कर आ के हमे प्रणाम करने लगे। आजाद उन्हे कर रहा था " "मास्क लगा के आना" और दूरी बनाए रखना। मैंने पूछा "बेटे कितनी दूरी होनी चाहिए?" उसने उत्तर दिया "2 गज"। "वैरी गुड" प्रधानाचार्य महोदय जी ने कहा। "सभी दो गज की दूरी में बैठ जाओ, सर आप का काम देखेंगे।" वो खुद भी बैठ गया। मैंने पूछा " बेटे आजाद आपकी कापियां कहां है?" वो खड़ा उठा सिर झुकाया और कहा "सर अभी पापा ने नहीं लाई, लेकिन मुझे पूरे पाठ याद है जो टाइम टेबल में है। मैंने पिछले साल के 11 वालों से किताबों का जुगाड कर लिया था।" प्रधानाचार्य जी हंस पड़े। सर 392 मार्क्स है इस बच्चे के क्लास 10th में।" मैंने कहा। अच्छा "वैरी गुड" प्रधानाचार्य जी ने कहा। मैंने कहा बेटा अपने पिता जी का मोबाइल नंबर दो। उसने नंबर दिया। मैंने कॉल की और कहा "तुरंत थती के पास आ जाओ" "जी गुरु जी" मैं दूसरे बच्चों की उत्तरपुस्तिकाओं का अवलोकन करने लगा। और आजाद को बैठने के लिए कहा। इसी बीच एक दुबला - पतला व्यक्ति मेरे पास आया और याचक की भांति खड़ा हो कर बोला "प्रणाम गुरु जी, मैं आजाद का पिता जी" मैंने उन्हे बैठने को कहा और पूछा कि अभी तक कॉपियां क्यों नहीं लाई। उसने कहा मेरे पास आज कल एक रुपए नहीं है, ना ही कोई काम है। उसने शर्म से अपनी नजरे झुकाई। "एक दो दिन में ले आऊंगा गुरु जी" हमने बच्चों से बातचीत की उनके कार्य का अवलोकन किया। तब तक 4 बज चुके थे।
एक पूर्व छात्र हमे देख कर, हमारे पास आया हमें प्रणाम की और सम्मान पूर्वक कहा " चलो सर घर चलो आपने खाना नहीं खाया होगा। मैं हंसा और पूछा आपको कैसे पता? उसने उत्तर दिया " सर आप सुबह 8 बजे यहां से गुजरे अब 4 बज चुके है तो कहां खाया होगा?! भूख तो बहुत लग रही थी मन भी कर रहा था लेकिन मैंने उससे कहा "बेटे हम फिर कभी आएंगे आजकल कॉविड 19 का दौर है।" उसने काफी कोशिश की लेकिन हम नहीं गए। घर आते - आते साढ़े चार बज चुके थे। मैंने आ कर तुरंत खाना खाया लेकिन प्रधानाचार्य ही ने 5 बजे खाया होगा। वो सुबह दाल बना कर जाते है चावल आकर बनाते है। दूसरी सुबह 4 बजे नींद खुली तो आजाद जैसे बच्चों के ख्याल मन मस्तिष्क में उठने लगे।
ये पहली घटना भी नहीं थी। जिसके पास पैसा है उसका व्यवसाय घाटे में हो सकता है लेकिन भूखा नहीं होगा। उनके बच्चे भी पढ रहे होंगे। लेकिन साधन हीन व्यक्ति दोहरी मार झेल रहा है। इधर पेट भूखा उधर बच्चे पढ नहीं पा रहे है। लाक्षणिक रूप से "थाती" में पांडव नृत्य हर साल होता है देवता अवतरित होते है लेकिन वो भी चंदा ही ले कर जाते है। खयालातों में डूबे मन मस्तिष्क ने आंखे भर दी।
कॉलेज जाते समय कॉपियां खरीदी और आजाद को उसके घर दे आया। उसी दिन शाम को 10 बजे मेरे फ़ोन की घंटी बजी मैंने कॉल रिसीव की " सर प्रणाम, मैं आजाद, मैंने आज का काम कर लिया है।" उसकी आवाज में गजब की खुशी, आत्मविश्वास और उत्साह था। अभी न जाने इस देश में कितने #आजाद# साधनों के अभाव के कारण शिक्षा से पिछड़ रहे होंगे। उनका न वर्तमान सुरक्षित है और ना ही भविष्य। क्या उन्हे भी कोई कॉपियां लाकर देगा??!?
R L ARYA ( प्रवक्ता राजकीय इंटर कॉलेज मोल्टाडी )


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