कडकडाती ठंड व बर्फीली हवाओ के बीच हड़ताल पर बैठी आंगनबाड़ी कार्यक्रतियों पर दया क्यो नही - बीएस रावत की नमोन्यूज़ के लिए खास रिपोर्ट

दिसम्बर, जनवरी की कड कडाती बर्फली हवाऔ के बीच महिलाओं पर दया नही है, उत्तराखंड सरकार को?
बी, एस, रावत,
आंगनवाडी कार्यक्रतियो की जायज मांग की अनदेखी उतराखन्ड सरकार को  2022 के लिए महगी साबित हो सकती है, आगनबाडी कार्यक्रतियो की नाराजगी के लिए यह सबूत ना काफी है! अपितू ईस वर्ष की बर्फबारी ठन्डी सर्दहवाऔं ने भी आम जन जीवन को हिला कर रख दिया है! वही आंगनवाडी कार्यक्रतिया  देहरादून परैडग्राउन्ड ,उतरकाशी, चमोली, पौडी सहित पुरे उत्तराखंड में अपनी जायज मांग के लिए  जिला व तहसील स्तर पर आन्दोलित है! लेकिन जहां राजनेता महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए आरक्षण का दिखावा कर महिलाओं की समस्या का निदान की जिमेदारी बखुबी मंच से उचे भाषणो के माध्यम से निभाने  के वादे करते है! वंही आज महिला व बाल विकास के प्रति  जिम्मेदार मंन्त्री  आंगनवाडी कार्यकत्रीयौ की मांग के समुख क्यौ नही है! प्रश्न यह उठता है कि महिलाऔ की मांग उठाने मे विधान सभा मे किस के सहारे कि आवश्यकता होगी, क्या महिला व बालविकास के प्रति सदन मे  मंत्री व विधायक  की बात का कोई बजूद नही होगा या फिर महिलाओं की मांग के लिए सदन मे शायद कोई जगह नहि, यह स्वतंत्रप्रणाली के हास का विशय है, जब कोई भी नेता मांग उठाने वाले समूह से  दूर रहने की बात सोचता है! बालविकास मंन्त्री  के इन महिलाओं के बीच जाने मे भी यही हाल लगता है, न जाने राज्य सरकार का क्या पेंच फसा है? यंहि  अगर श्रम मंन्त्रालय की और देखा जाय तो बालविकास , महिला दलित शोषित के हितो, मे कानून बनाकर, भारत सरकार ने रख तो दिये है! किन्तु ईनका परिपालन कैसै कब कौन करेगा । भारत सरकार के श्रम कानून का ही नियम बताता है कि श्रमिको का श्रमाशं मे कोताही बरतने वालो के खिलाफ सख्ती बर्ती जायेगी ! किन्तु आगनबाडी कर्यकत्रीयौं के अनुसार समय से भी अधिक काम इसके पश्चात भी पुरा दैनिक श्रमांश न मिलना  श्रम कानून का उपहास है! यंहा पुख्ता सबूत है, कि मिनी आंगनवाडी कार्यक्रतियों को केवल सौ रूपया दिन का मिलता है! आप यंही समझ गये होगें कि श्रम  कानून की कितनी पकड देश के राज्यों में है! क्या हर बार केन्द्र सरकार को राज्य सरकारो के लिए नए मापदंड तैयार करने होंगे! या भारत सरकार की भी मिली भगत  ईसका हिस्सा बन चुकी है? यह एक बहुत बडा अन्याय है! जिनके पास बालविकास बच्चो के विकास की डगर दी गई, फिर उनके पास बी, एल, ओ, का कार्य, जन्म, पंजियन, पोलियो, ईसी तरह के अन्य कार्य मे शामिल किया जाना,    कार्य करवाया जाना तो आंगनवाडी कार्यक्रतियों से ठीक लगता है! किन्तु काम के बदले दाम तो मिलने ही चाहिए! यह श्रम कानून ने भी व्यवस्था कानून में दी है! अब देखना है कि काम के बदले दाम वाले की जीत होती हैं! या फिर सत्ताधारी सफेदपोश की?

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