पुरोला का रण; दो चिर प्रतिद्वंद्वी एक विधायक दुर्गेश्वर के पक्ष में दूसरा विपक्ष में । वर्ष 2027 का चुनाव परिणाम बतायेगा कि राजा में है दम या राम बनेंगे गोविन्द।

 पुरोला का रण हमेशा से ही रोमांचक रहा है। यहाँ चुनावों से से पहले ही लोग अपने अपने प्रत्याशी के समर्थन में लामबंदी शुरू कर देते हैं। ऐसे में दो चिर प्रतिद्वंद्वी राजेंद्र सिंह रावत ( राजा) व गोविन्द राम नौटियाल का जिक्र करना एक विषय बनता हैं। 

इस आलेख को पुरोला विधानसभा के अंतर्गत सिर्फ पुरोला विकासखंड के बारे में ही पढ़ा व समझा जाय , ऐसा पाठकों से अनुरोध है।


बात कर रहे पूर्व अध्यक्ष राज्य आंदोलनकारी संघ पुरोला राजेंद्र सिंह रावत (राजा) व पूर्व में डीपीसी सहित तमाम राजनीतिक दलों के पूर्व अध्यक्ष रहे गोविंदराम नौटियाल की तो दोनों के आपसी रिश्ते मधुर व सौहार्दपूर्ण रहे हैं। पर राजनीति में दोनों ही धुर विरोधी रहे हैं। दोनों प्रतिद्वंद्वी एक ही ग्राम पंचायत चंदेली में निवासरत है व जैसा कि लिखा गया है सम्बन्ध भी मैत्रीपूर्ण है। मैत्रीपूर्ण संबंध होने के बावजूद दोनों की राजनीति में शायद कभी पटी हो ।

आवरण कथा की शुरुआत गोविंदराम नौटियाल से करनी ईमानदारी होगी । गोविंदराम नौटियाल का व्यक्तित्व कितना बड़ा है इस बात का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि वर्ष 1987 में जब प्रधान चुनावों की मतगणना हो रही थी,तो खुद स्वर्गीय बीएल जुवांठा इनकी जीत की घोषणा तक मतगणना स्थल पर मौजूद रहे। उस समय तत्कालीन विधायक व मंत्री बलदेव सिंह आर्या बिल्कुल भी नहीं चाहते थे कि गोविन्द राम जीते । स्वर्गीय बीएल जुवांठा के लिये गोविंदराम का जितना बेहद जरूरी था क्योंकि उस समय वे पुरोला में लोकदल की रीढ़ थे ।

गोविन्दराम का सफर जनता पार्टी, दमकीपा, लोकदल, लोकदल ब, जनमोर्चा, जनता दल, सजद, सजपा, सपा , कांग्रेस व बीजेपी सहित लगभग दर्जनभर राजनीतिक दलों का रहा हैं।अपनी ग्राम पंचायत के 2 या तीन बार प्रधान व एक बार जिला पंचायत सदस्य भी रहे है। राजनीति में गोविंदराम हमेशा मुख्य भूमिका में रहे हैं। उन्होंने स्वर्गीय बीएल जुवांठा,  राजेश जुवांठा, मालचंद व दुर्गेश लाल को जीतने के लिए मुख्य भूमिका में रह कर कार्य किया है।

अब बात करे गोविंदराम के मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजेंद्र रावत ( राजा) की तो वर्ष 2008 के पंचायत चुनावों में बीडीसी मेंबर के चुनाव में उन्होंने गोविंदराम को हराकर भारी उलटफेर कर दिया। राजा से हारना गोविंदराम के लिए सिर्फ एक हार नहीं थी अपितु उनके ब्लॉक प्रमुख बनने की महत्त्वकांक्षा पर भी विराम लग गया । इस हार के बाद गोविंदराम फिर कभी जनप्रतिनिधि नहीं बने पर राजनीति में उनकी भूमिका आजतक बनी हुई है।

बात करे वर्ष 2012 विधानसभा चुनावों की तो यहां पर राजा समर्थित मालचंद चुनाव जीते व गोविंदराम समर्थित स्वर्गीय राजेश जुवांठा चुनाव हार जाते है। फिर आया वर्ष 2017 का चुनाव तो यहां पर एक बार दोनों पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंदिता छोड़ एक हुए पर परिणाम प्रतिकूल रहा । इसके ठीक बाद हुए पुरोला नगर पालिका के चुनावों में फिर से दोनों आमने सामने हुए पर दोनों के समर्थित उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं रहे। दोनों के बीच प्रतिद्वंदिता को जारी रखते हुए राजा समर्थकों ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी के खिलाफ जमकर भड़ास उतारी व गोविंदराम को अपने ही गांव में बीजेपी उम्मीदवार को वोट दिलाने के लाले पड़ गये। कुल मिलाकर राजा से राजनीतिक दुश्मनी गोविंदराम को इतनी भारी पड़ी की विकासखंड पुरोला की राजनीति का बड़ा चेहरा खुद के ही गांव में उलझ गया।

बात करे गत वर्ष हुए पुरोला नगर पालिका के चुनाव की तो ये भी गोविंदराम के लिए भारी रहा । वे न तो भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में खुलकर प्रचार कर सके व न चुप रह सके मतलब एक बार फिर हार।

अब चिर प्रतिद्वंद्वी है तो आगामी विधानसभा चुनावों की भी बात कर लेते है। यहाँ एक बात लिखनी जरूर है कि दोनों के नाम के साथ पूर्व अध्यक्ष, पूर्व प्रधान, पूर्व बीडीसी व पूर्व डीपीसी जैसी उपाधियां जुडी हुई है। इससे दोनों के राजनीतिक कद का आंकलन किया जा सकता हैं।

वर्तमान परिदृश्य में गोविंदराम विधायक दुर्गेश्वर लाल के करीबी व राजा उनके विपक्षी गठबंधन के प्रमुख चेहरे हैं।

देखना ये होगा कि आगामी विधानसभा चुनावों में कौन किसपर भारी पड़ता हैं।

डिस्क्लेमर: उपरोक्त पोस्ट केवल राजनीतिक संदर्भ में लिखी गई हैं। पोस्ट का उद्देश्य किसी को निजी हानि पहुंचाना नहीं है

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