गजेन्द्र सिंह चौहान | नमो न्यूज
विश्व राजनीति में किसी देश की ताकत केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, सैन्य क्षमता या अंतरराष्ट्रीय प्रभाव से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उसका नेतृत्व दबाव की परिस्थितियों में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे करता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी यही सबसे बड़ी कसौटी है।
अमेरिका दुनिया की प्रमुख शक्तियों में शामिल है। उसके साथ भारत के व्यापारिक, सामरिक और तकनीकी संबंध महत्वपूर्ण हैं। लेकिन किसी भी रिश्ते की मजबूती तभी कायम रह सकती है, जब उसमें आपसी सम्मान और बराबरी का भाव हो। मित्रता का अर्थ किसी के सामने झुकना नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा करते हुए सहयोग के रास्ते तलाशना है।
सवाल अमेरिका से दोस्ती का नहीं, भारत के स्वाभिमान का है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका और मजबूत नेतृत्व की छवि को प्रमुखता से प्रस्तुत किया है। ऐसे में जनता की अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर कोई समझौता केवल दबाव में न किया जाए। व्यापार हो, टैरिफ का सवाल हो, ऊर्जा सुरक्षा हो या विदेश नीति—हर निर्णय में भारत की जरूरतों और दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
कूटनीति में समझौते करना कमजोरी नहीं है। कई बार बातचीत, लचीलापन और पारस्परिक सहयोग ही देश को अधिक लाभ दिलाते हैं। लेकिन जब कोई समझौता राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाए या देश की नीतिगत स्वतंत्रता को सीमित करे, तब उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिरकार, किसी भी सरकार की सफलता का आकलन उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके फैसलों के परिणामों से होता है।
नरेंद्र मोदी के लिए भी इतिहास में स्थान तय करने वाला प्रश्न यही होगा कि उन्होंने वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों में भारत की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को कितना सुरक्षित रखा। यदि कोई फैसला अमेरिकी दबाव के आगे राष्ट्रीय हितों से समझौते के रूप में सामने आता है, तो उसकी आलोचना होगी। वहीं, यदि बातचीत के माध्यम से भारत अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए लाभ हासिल करता है, तो उसे प्रभावी कूटनीति माना जाएगा।
इतिहास केवल नारों को नहीं, निर्णयों के परिणामों को याद रखता है।
आज भारत की जनता को भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर ठोस जवाब चाहिए। क्या भारत अपने आर्थिक और सामरिक हितों पर स्वतंत्र निर्णय ले रहा है? क्या अंतरराष्ट्रीय समझौतों में देश को उचित लाभ मिल रहा है? क्या भारत की विदेश नीति किसी एक महाशक्ति पर निर्भर होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ रही है? इन सवालों के जवाब ही नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा हैं।
अंततः, प्रधानमंत्री किसी पार्टी के नहीं, पूरे देश के प्रतिनिधि होते हैं। उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत की संप्रभुता, सम्मान और जनता के हितों की रक्षा करना है। अमेरिका हो या कोई अन्य महाशक्ति, भारत के संबंध सहयोग और समानता के आधार पर ही आगे बढ़ने चाहिए।
क्योंकि इतिहास में वही नेतृत्व सम्मान पाता है, जो परिस्थितियों के अनुसार समझौते तो करता है, लेकिन देश के स्वाभिमान और राष्ट्रीय हितों की कीमत पर नहीं।

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