लाल-चंद के बीच फंसी कांग्रेस, दावेदार कई मगर खुलकर समर्थन देने वाले मौन
क्या बीजेपी के बागी फिर हाँकेंगे कांग्रेस का रथ या पार्टी के भीतर से निकलेगा तारणहार?
पुरोला विधानसभा में कांग्रेस इस समय ऐसे राजनीतिक चौराहे पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां एक तरफ टिकट के लिए दावेदारों की लंबी कतार है तो दूसरी तरफ पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर असमंजस और उत्साहहीनता साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पार्टी इस बार किसी पुराने “बाहरी चेहरे” पर दांव लगाएगी या फिर वर्षों से संगठन में काम कर रहे किसी स्थानीय कार्यकर्ता को मौका मिलेगा।
पुरोला की राजनीति में पिछले दो विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए सबक भी रहे हैं और चेतावनी भी। वर्ष 2017 में बीजेपी से बागी हुए राजकुमार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने, लेकिन कार्यकाल के अंतिम दौर में कांग्रेस को अलविदा कहकर पुनः बीजेपी में चले गए। इसके बाद वर्ष 2022 में बीजेपी से बागी हुए मालचंद कांग्रेस के प्रत्याशी बने, लेकिन चुनाव हारने के बाद वे भी दोबारा बीजेपी में शामिल हो गए। इन घटनाओं ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भीतर यह भावना मजबूत कर दी है कि पार्टी को अब “उधार के नेताओं” के बजाय अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना चाहिए।
हालांकि कांग्रेस के भीतर एक वर्ग अब भी ऐसा है जो मानता है कि यदि चुनावी समीकरण मजबूत करने हों तो मालचंद या राजकुमार जैसे प्रभावशाली चेहरों पर फिर से विचार किया जा सकता है। यही वजह है कि पार्टी के भीतर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
यदि संभावित दावेदारों की बात करें तो सबसे चर्चित नाम नगर पालिका पुरोला अध्यक्ष बिहारी लाल शाह का है, जिन्होंने हाल ही में हुए नगर पालिका चुनाव में भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी। इसके अलावा बीएल आर्या भी कांग्रेस के मजबूत विकल्प माने जा रहे हैं। छात्र राजनीति से कांग्रेस से जुड़े रहे बीएल आर्या हाल ही में अधिशासी अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और “जन एकता मंच” के माध्यम से लगातार सक्रिय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। मोरी क्षेत्र में उनके रोड शो और बैठकों ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है।
शमी बोरियांन का नाम भी तेजी से उभर रहा है। पंचायत चुनाव में उनकी पत्नी की रिकॉर्ड जीत ने उनकी राजनीतिक पकड़ को मजबूत किया है। बताया जा रहा है कि वे भी कांग्रेस नेतृत्व के संपर्क में हैं। वहीं हरिमोहन जुवांठा, जो पूर्व मंत्री स्वर्गीय बीएल जुवांठा के परिवार से आते हैं, लगातार जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं।
प्रकाश चंद को कांग्रेस के भीतर एक “शांत रणनीतिकार” के रूप में देखा जाता है। वे सार्वजनिक भाषणों से अधिक संगठनात्मक काम पर भरोसा करते हैं और बताया जाता है कि उन्होंने अपना मजबूत कैडर तैयार किया हुआ है। कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व से उनके संबंध भी मजबूत माने जाते हैं। मोहनलाल बुराटा लंबे समय से पार्टी की विचारधारा को जमीनी स्तर पर आगे बढ़ाने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। वहीं सचिन कुमार पिछले तीन वर्षों से लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हुए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जहां बीजेपी में टिकट के लिए मुख्य रूप से दो-तीन चेहरों की चर्चा होती है, वहीं कांग्रेस में टिकट के दावेदारों की संख्या दर्जन के करीब पहुंचती दिखाई दे रही है। लेकिन दावेदारों की अधिकता कहीं न कहीं संगठन की कमजोरी को भी उजागर करती है, क्योंकि अब तक किसी एक चेहरे पर व्यापक सहमति बनती नजर नहीं आ रही।
अगर संगठनात्मक स्थिति पर नजर डालें तो पुरोला विधानसभा में कांग्रेस पिछले एक दशक में मजबूत बूथ स्तर का ढांचा खड़ा नहीं कर पाई है। बीजेपी जहां बूथ स्तर तक कार्यक्रम और बैठकों के माध्यम से लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखती है, वहीं कांग्रेस के ब्लॉक स्तर के कार्यक्रमों में भी सीमित संख्या में कार्यकर्ता ही नजर आते हैं।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भीतर राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर भी असहजता महसूस की जा रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में लगातार चुनावी पराजयों ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित किया है। आम जनता के बीच जब राहुल गांधी को लेकर सवाल उठते हैं तो स्थानीय कार्यकर्ता अक्सर ठोस जवाब देने की स्थिति में नजर नहीं आते। इसका असर संगठनात्मक ऊर्जा पर भी साफ दिखाई देता है।
स्थानीय स्तर पर अधिकांश कांग्रेस कार्यकर्ता प्रीतम सिंह को अपना सर्वमान्य नेता मानते हैं, लेकिन टिकट वितरण में उनकी वास्तविक भूमिका कितनी प्रभावी रहेगी, इसे लेकर कार्यकर्ताओं के भीतर संशय बना रहता है। यही कारण है कि कांग्रेस के भीतर अभी भी नेतृत्व और रणनीति को लेकर स्पष्टता दिखाई नहीं देती।
अब देखना दिलचस्प होगा कि पुरोला में कांग्रेस इस बार फिर किसी बीजेपी बागी पर भरोसा करती है या वर्षों से पार्टी का झंडा उठाए कार्यकर्ताओं में से किसी चेहरे को आगे बढ़ाकर नया राजनीतिक संदेश देने का प्रयास करती है।
अस्वीकरण
यह आलेख किसी भी व्यक्ति विशेष को महिमामंडित अथवा अपमानित करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। यदि किसी व्यक्ति की भावना या प्रतिष्ठा को इससे ठेस पहुंची हो तो उसके लिए खेद है।

0 टिप्पणियाँ