मनुस्मृति 8.271
नामजातिग्रहं शूद्रः कुर्यात् द्विजमुपद्रुतः।
तस्यास्ये लौहमाधाय निर्वास्यश्च राष्ट्रतः॥
अर्थ:
यदि शूद्र द्विज को जाति या नाम लेकर अपमानित करे, तो उसके मुख में तप्त लोहा डालने और देश से निकालने का दंड कहा गया है।
राजा को सभी वर्णों की रक्षा करने का निर्देश दिया गया है
अनुचित हिंसा या हत्या पर सामान्य दंड नियम शूद्र पर भी लागू बताए गए हैं
जीविका और संरक्षण
मनुस्मृति में यह भी कहा गया है कि राजा का कर्तव्य है कि वह सभी वर्णों की रक्षा करे, जिसमें शूद्र भी शामिल हैं।
भावार्थ:
शूद्र को केवल दायित्व वाला नहीं, बल्कि राज्य द्वारा संरक्षित नागरिक भी माना गया।
मनुस्मृति: धर्म, सत्य और न्याय का प्राचीन दर्शन
विशेष आलेख | News Namo
भारतीय सभ्यता के प्राचीन धर्मशास्त्रों में मनुस्मृति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसे मानव धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसार इसके रचयिता महर्षि मनु माने जाते हैं, जिन्हें मानव समाज का आदि विधाता कहा गया है। मनुस्मृति में समाज, धर्म, आचार, न्याय और कर्तव्यों से जुड़े अनेक श्लोक मिलते हैं, जो उस समय की सामाजिक व्यवस्था को दर्शाते हैं।
धर्म की मूल अवधारणा
मनुस्मृति में धर्म को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है कि वेद, विद्वानों की स्मृति, सज्जनों का आचरण और आत्मा की संतुष्टि—ये सभी धर्म के आधार हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धर्म व्यवहार और नैतिकता से भी जुड़ा हुआ है।
सत्य और मधुर वाणी का संदेश
मनुस्मृति का एक चर्चित श्लोक सत्य बोलने पर बल देता है, लेकिन साथ ही यह भी कहता है कि ऐसा सत्य न बोला जाए जिससे किसी को अनावश्यक पीड़ा पहुँचे। यह विचार आज के समय में भी सामाजिक सौहार्द के लिए प्रासंगिक माना जाता है।
ज्ञान को बताया गया मुक्ति का मार्ग
ग्रंथ में अज्ञान को बंधन और ज्ञान को परम सुख बताया गया है। इससे यह संदेश मिलता है कि शिक्षा और विवेक के बिना मनुष्य का विकास संभव नहीं है।
नारी सम्मान का उल्लेख
मनुस्मृति का एक महत्वपूर्ण श्लोक कहता है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है। यह श्लोक भारतीय परंपरा में स्त्री सम्मान के महत्व को रेखांकित करता है।
कर्म और न्याय की अवधारणा
मनुस्मृति में कर्म सिद्धांत का स्पष्ट उल्लेख मिलता है—मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। साथ ही राजा और शासन के लिए न्यायपूर्ण दंड व्यवस्था को समाज की रक्षा का आधार बताया गया है।
आधुनिक संदर्भ में मनुस्मृति
विशेषज्ञों का मानना है कि मनुस्मृति में जहाँ एक ओर उच्च नैतिक और दार्शनिक विचार हैं, वहीं कुछ नियम समय-सापेक्ष हैं, जिनकी आधुनिक समाज में आलोचना भी होती है। इसलिए आज मनुस्मृति को ऐतिहासिक और वैचारिक ग्रंथ के रूप में पढ़ा जाना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
👉 कुल मिलाकर, मनुस्मृति भारतीय बौद्धिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

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