चिनाव की लहरों पर भारत का 'पावर गेम': पाकिस्तान में मची खलबली । ​भारत का कड़ा रुख: "हक हमारा, डर तुम्हारा क्यों?" पाकिस्तान दे रहा है गीदड़ धमकी ।

 चिनाव की लहरों पर भारत का 'पावर गेम': पाकिस्तान में मची खलबली

​नई दिल्ली/इस्लामाबाद: सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) की दशकों पुरानी लक्ष्मण रेखा अब पाकिस्तान के लिए गले की फांस बनती जा रही है। जम्मू-कश्मीर में चिनाव नदी पर भारत की निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं ने इस्लामाबाद की रातों की नींद उड़ा दी है। एक तरफ भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिमालय की गोद में कंक्रीट के ऊंचे बांध खड़ा कर रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान इसे अपने 'अस्तित्व' पर खतरे के रूप में देख रहा है।


​बेचैनी की बड़ी वजहें

​चिनाव नदी पर चल रहे प्रोजेक्ट्स—खासकर रतले (Ratle) और किरू (Kiru) जलविद्युत परियोजनाएं—विवाद के केंद्र में हैं। पाकिस्तान की घबराहट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

​पानी के बहाव पर नियंत्रण: पाकिस्तान को डर है कि भारत इन बांधों के जरिए चिनाव के पानी को नियंत्रित कर सकता है, जिससे उसकी खेती और सिंचाई व्यवस्था ठप हो सकती है।

​रणनीतिक बढ़त: ऊंचे बांधों का निर्माण भारत को विषम परिस्थितियों में पानी के बहाव को मोड़ने या रोकने की क्षमता देता है, जिसे पाकिस्तान 'वाटर वॉर' की तैयारी मानता है।

​डिजाइन पर आपत्ति: पाकिस्तान लगातार वर्ल्ड बैंक के पास इन प्रोजेक्ट्स के डिजाइन को लेकर शिकायतें दर्ज करा रहा है, जिन्हें भारत ने हमेशा तकनीकी रूप से सही और संधि के अनुकूल बताया है।

​भारत का कड़ा रुख: "हक हमारा, डर तुम्हारा क्यों?"

​भारत ने साफ कर दिया है कि वह सिंधु जल समझौते (1960) के दायरे में रहकर ही काम कर रहा है। भारत का तर्क है कि 'रन ऑफ द रिवर' प्रोजेक्ट्स से पानी की मात्रा में कोई कमी नहीं आती, बस उसकी गति का उपयोग बिजली बनाने में किया जाता है।

​"भारत अब 'उपयोग करो या खो दो' (Use it or lose it) की नीति पर चल रहा है। कश्मीर के विकास के लिए चिनाव का पानी बिजली बनकर घर-घर रोशन करेगा, और इसमें किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है।"

​पाकिस्तान के लिए चिनाव महज एक नदी नहीं, बल्कि उसकी लाइफलाइन है। लेकिन भारत के लिए यह उसकी संप्रभुता और विकास का अधिकार है। इस्लामाबाद की 'इंटरनेशनल कोर्ट' वाली दौड़ और बयानबाजी भारत के कड़े इरादों के सामने फिलहाल बेअसर साबित हो रही है। चिनाव की गूँज अब केवल घाटी में नहीं, बल्कि कूटनीति के गलियारों में भी सुनाई दे रही है।

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