माँ की याद में शिवम की आत्मभाव से निकले यादों के झरोखे

ख्वाबवो को पंख लगा रहा हूँ माँ, तेरे ख्वाब सजा रहा हूँ माँ
Amazon offer upto 70% discount through this link, please click and know your offer खुद भूखी रही मुझे खाना खिलाया माँ
खुद गिले में सोई मुझे सुखे में सुलाया माँ
तन्हा रही खुद मगर मेरा साथ निभाया माँ

मेरी हर गलती में तुने मुझे समझाया माँ
अब काबिल हो गया हूँ तेरी खिदमत को माँ
वो पंख लगा रहा हूँ माँ ,तेरे ख्वाब  सजा रहा हूँ माँ।
एक दिन प्यास लगी थी हम दोनों को
मगर पानी की एक बूंद थी
तूने यह कह कर पिला दी मुझे, की पानी न भी मिले तो भी जी लूंगी देख तुझे
डर ये नहीं था की दुनिया क्या कहेगी
प्यार तो अपनी कोख से था
दुनिया तो आज तक न जान पाइ की उन नौ महीनों का कर्ज क्या था
 ये जिंदगी तरी सपने तेरे ये अरमान पूरे कर रहा हूँ माँ
वो पंख लगा रहा हूँ माँ, तेरे ख्वाब सजा रहा हूँ माँ।
खुद की ख्वाहिश मेरी बस यही, की जब जाऊँ ख्वाबों के शहर में तो सगुन बन कर खड़ी हो जाना माँ
अपने हाथों से मेरे माथे पर विजय तिलक लगाना माँ
सपनों को हकीकत में बदलने जा रहा हूँ माँ
वो पंख लगा रहा हूँ माँ, तेरे ख्वाब सजा रहा हूँ माँ।

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